नई उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम ने 3 महीने में (लैब‑जांच वाले मामलों में 5 महीने) निपटारे का कड़ा मानक तय किया है, फिर भी उत्तराखंड के जिला व राज्य उपभोक्ता आयोगों में मामलों की लंबी कतारें जनता के भरोसे को झकझोर रही हैं। काशीपुर के सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन द्वारा 2016‑2026 की अवधि में राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग से मांगी गई जानकारी ने इस असंतुलन को उजागर किया। लोक सूचना अधिकारी वंदना शर्मा के द्वारा प्रदान किए गए आँकड़े दिखाते हैं कि अप्रैल 2016 तक राज्य आयोग में 701 मूल परिवाद और 1,401 प्रथम अपीलें पेंडिंग थीं, जबकि 13 जिला आयोगों में कुल 3,127 केस अभी भी लटके हुए थे।
इन लंबित मामलों में से 27 राज्य‑स्तरीय अपीलें 10 साल से अधिक पुरानी हैं; 125 केस 10 साल, 148 केस 7 साल और 201 केस 5 साल से बिना निर्णय के इंतज़ार कर रहे हैं। मूल परिवादों में भी 9 केस 10 साल से अधिक, 22 केस 10 साल से अधिक समय तक टिका हुआ है। जिला स्तर पर 26 केस 10 साल से अधिक, 62 केस 10 साल, 217 केस 7 साल और 647 केस पिछले पाँच सालों से निपटारे की राह देख रहे हैं, जिससे न्याय प्रणाली की सुस्ती स्पष्ट होती है।
साथ ही शिकायतकर्ताओं की संख्या में निरंतर गिरावट देखी गई। 2016 में राज्य आयोग में 292 और जिला आयोगों में 1,462 केस दर्ज हुए थे; 2019 में यह क्रमशः 468 और 1,365 तक बढ़ा, पर 2023 में घटकर केवल 116 एवं 970 केस रह गए। 2024 में सबसे कम आँकड़े दर्ज हुए – केवल 29 राज्य और 574 जिला मामलों के साथ। 2025 में थोड़ी उछाल के बाद, 2026 के पहले चार महीनों में ही राज्य आयोग में 58 और जिला आयोगों में 311 केस सामने आए।
संकट के मुख्य कारण बीमा और बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी शिकायतें हैं। 31 मार्च 2026 तक के डेटा में बीमा से 130 मूल परिवाद और 2,261 अपीलें, बैंकिंग से 27 मूल परिवाद और 566 अपीलें दर्ज हैं। बिजली, बिल्डर्स, मेडिकल लापरवाही, शिक्षा, डाक, टेलीकॉम, सरकारी हाउसिंग और रेलवे जैसे क्षेत्रों से भी क्रमशः कई सौ मामलों की शिकायतें आई हैं। जब हर्जाना या रिफंड पाने के लिए दशकों तक न्यायालय में घुसे रहना पड़ता है, तो आम जनता शिकायत दर्ज करने से ही दूर रहने लगती है। यदि खाली पदों को भरकर निपटारे की गति नहीं बढ़ाई गई, तो उपभोक्ता संरक्षण कानून का मूल उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाएगा।
