भारत में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ को लोकतंत्र का सबसे पवित्र स्तंभ माना जाता है। परंतु जब वही स्तंभ आँकड़ों की भूलभुलैया, सॉफ्टवेयर के एल्गोरिदम और फर्जी आपत्तियों के दलदल में उलझ जाता है, तो सवाल उठना अनिवार्य है। उत्तराखंड में निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे ‘सिर्’ (सविस्तर निरीक्षण और पुनरीक्षण) अभियान ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में भूचाल ला दिया है।
पहले चरण में, 14 जुलाई को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में 2022 की अंतिम सूची (79.6 लाख) के मुकाबले मतदाताओं की संख्या घटकर 71.33 लाख रह गई। अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट वोटरों के नाम पर 8 26 977 मतदाताओं को सूची से हटाया गया। इसके बाद के चरण में 1.73 लाख फॉर्म‑7 आवेदनों के ज़रिये 95 000 से अधिक मतदाताओं को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के कारण ‘अयोग्य’ घोषित कर दिया गया। कुल मिलाकर, लगभग सवा नौ लाख मतदाता इस प्रक्रिया में अपना मताधिकार गंवाने के कगार पर हैं।
सिर् के दौरान फर्जी आपत्तियों का भी पता चला। पूरे प्रदेश में लगभग 20 000 आपत्तियाँ पूरी तरह नकली निकलीं, जिनमें ऊधमसिंह नगर जिले में एक भाजपा नेता के नाम से 6 000 से अधिक फर्जी आपत्तियाँ दर्ज कराई गई थीं। पूर्व कांग्रेस विधायक मनोज रावत ने खुलासा किया कि पार्टी विधायक फुरकान अहमद का नाम कटवाने के लिए किसी हमनाम व्यक्ति के नाम से फर्जी आपत्ति दाखिल की गई, जबकि उस व्यक्ति ने इससे साफ इनकार किया।
इस विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ‘इरोनेट’ और ‘ईसीआईनेट’ हैं, जो मामूली स्पेलिंग मिस्टेक, रिश्तेदारों की उम्र में अंतर या परिवार में 6 से अधिक बच्चे होने जैसी स्थितियों को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के रूप में फ्लैग कर देते हैं। इसके बाद अधिकारी सिस्टम पर मतदाता को ‘अयोग्य’ मार्क करते हैं, जिससे ऑटो‑जनरेटेड फॉर्म‑7 बनता है। आयोग का तर्क है कि 3 अक्टूबर को अंतिम सूची आने के बाद फॉर्म‑6 भरकर नाम जुड़वा सकते हैं, परंतु फॉर्म‑6 मुख्य रूप से नए मतदाताओं के लिए है, जिससे पुराने वोटरों को गलत ब्योरा देने का कानूनी खतरा मंडराता है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रियाएँ तेज़ हुईं। दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिर् प्रणाली पर सवाल उठाया और आरोप लगाया कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के नाम पर विपक्ष‑समर्थक और गरीब मतदाताओं के नाम छांटे जा रहे हैं। उसी समय, उत्तराखंड कांग्रेस ने देहरादून में सचिवालय का घेराव कर मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पुतले को जलाया, और सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि चुनाव आयोग के भीतर ही ‘गृहयुद्ध’ चल रहा है, जहाँ दो निर्वाचन आयुक्तों ने मुख्य आयुक्त के निर्णयों पर 14 बार लिखित असहमति दर्ज कराई है।
इन घटनाओं ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि 3 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने पर 9 लाख से अधिक नाम कटे हुए पाए गए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि सिर् के ‘सफाई अभियान’ में कितनी शुचिता आई और कितने जायज नागरिक मताधिकार से हाथ धो बैठे। चुनाव आयोग की साख तभी बहाल हो सकती है जब फर्जी आपत्तियों के दाखिलकर्ताओं पर आपराधिक मुकदमा चलाया जाए, डिजिटल ‘ऑटो‑रिमूवल’ की जगह शत‑प्रतिशत भौतिक सत्यापन लागू हो, और पारदर्शी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए।
Original Title: SIR: उत्तराखंड में सवा नौ लाख लोगों के वोट पर ‘डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक’?, नागरिकता पर आएगा संकट!
