उत्तराखंड में भारतीय वन सेवा (IFS) के प्रमुख अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई में अब तक १७ न्यायिक अधिकारी स्वयं को अलग कर चुके हैं, यह तथ्य फिर से चर्चा में आया है। इन अलगावों में दो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, उत्तराखंड हाई कोर्ट के चार न्यायाधीश, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के नौ न्यायिक सदस्य और दो जिला न्यायालय के न्यायाधीश शामिल हैं। सबसे हालिया विकास 21 सितंबर 2026 को CAT की दिल्ली पीठ से आया, जहाँ न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने चतुर्वेदी द्वारा दाखिल याचिका—जो उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के आदेश को चुनौती देती है और IFS अधिकारियों की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (APAR) के चैनल से संबंधित है—की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। आदेश में अलगाव के कारण का कोई विशेष उल्लेख नहीं किया गया, बल्कि मामले को उचित पीठ के सामने पुनः प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।
चतुर्वेदी के खिलाफ चल रही कानूनी लड़ाइयाँ लगभग तेरह साल से अधिक समय तक फैली हुई हैं और इनमें सेवा‑संबंधी विवाद, प्रतिनियुक्ति, मूल्यांकन रिपोर्ट, तथा कथित भ्रष्टाचार की जांच से जुड़े दस्तावेज़ी साक्ष्य शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश रंजन गोए और यू यू ललित ने क्रमशः 2013 और 2016 में इसी तरह के मामलों से अलगाव लिया था। उत्तराखंड हाई कोर्ट में भी राकेश थपलियाल (मई 2023), मनोज तिवारी (फ़रवरी 2024), आलोक वर्मा एवं रवींद्र मैठाणी (सितंबर‑अक्टूबर 2025) ने विभिन्न चरणों में सुनवाई से खुद को अलग कर दिया। CAT में भी फरवरी 2025 में हरविंदर ओबेरॉय और बी. आनंद ने चतुर्वेदी की मूल्यांकन रिपोर्ट के डाउनग्रेड से जुड़ी याचिका से अलगाव लिया, जबकि पहले भी कई न्यायिक सदस्यों ने समान मामलों में recusal किया था।
संजीव चतुर्वेदी, 2002 बैच के IFS अधिकारी, ने हरियाणा, केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति और उत्तराखंड में प्रमुख पदों पर कार्य किया, साथ ही दिल्ली के एम्बुलेंस सर्विस (EMS) में मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) के रूप में भी कार्यरत रहे। उनके कार्यकाल में उन्होंने हरियाणा और एम्बुलेंस सर्विस दोनों में भ्रष्टाचार के कई मामलों की जांच की, जिसमें Business Standard ने बताया कि CVO के रूप में उन्होंने लगभग ढाई साल में १६५ मामलों की जांच और कार्रवाई पूरी की। 2005‑2010 के बीच उनका 12 बार तबादला भी इन विवादों की पृष्ठभूमि को दर्शाता है।
अब CAT दिल्ली पीठ के नवीनतम आदेश के बाद १७ अलगावों की संख्या फिर से उजागर हुई है, पर यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ये सभी अलगाव अलग‑अलग मामलों और न्यायिक मंचों से संबंधित हैं, न कि केवल वर्तमान APAR याचिका से। इस क्रम में न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और संभावित हितसंबंधों की जांच को लेकर चर्चा फिर से तीव्र हो रही है।
Original Title: पांच साल में 12 तबादले…अब 17 न्यायिक अधिकारियों ने अलग-अलग मामलों की सुनवाई से खुद को किया अलग, जानिए कौन हैं IFS संजीव चतुर्वेदी
Original Content: Uttarakhand | Sanjeev Chaturvedi | IFS Case : उत्तराखंड कैडर के चर्चित भारतीय वन सेवा अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। उनके अलग-अलग मामलों की सुनवाई से अब तक 17 न्यायिक अधिकारी स्वयं को अलग कर चुके हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश, उत्तराखंड हाई कोर्ट के चार न्यायाधीश, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT के नौ न्यायिक सदस्य और जिला न्यायपालिका के दो न्यायाधीश शामिल बताए गए हैं।
हालिया मामला CAT की दिल्ली पीठ से जुड़ा है। 21 सितंबर 2026 को न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने संजीव चतुर्वेदी की एक याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। इस याचिका में उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के उस आदेश को चुनौती दी गई है….जो भारतीय वन सेवा अधिकारियों की मूल्यांकन रिपोर्ट यानी APAR के रिपोर्टिंग चैनल से संबंधित है। आदेश में सुनवाई से अलग होने की कोई विशेष वजह दर्ज नहीं की गई।
मामला उत्तराखंड में भारतीय वन सेवा अधिकारियों की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट यानी APAR की प्रक्रिया से जुड़ा है। संजीव चतुर्वेदी ने नवंबर 2021 में जारी उत्तराखंड सरकार के आदेश को चुनौती दी है। इसी मामले में CAT दिल्ली पीठ के न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने सुनवाई से खुद को अलग किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक चतुर्वेदी ने इस मामले में अखिल भारतीय सेवा अधिकारियों की APAR से संबंधित नियमों और सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के फैसले का हवाला दिया था। CAT के आदेश में यह भी दर्ज है कि चतुर्वेदी स्वयं मामले की पैरवी कर रहे थे।
17 न्यायिक अधिकारियों के अलग होने की बात क्यों चर्चा में?
संजीव चतुर्वेदी से जुड़े अलग-अलग मामलों में पिछले करीब 13 वर्षों के दौरान कई न्यायाधीशों ने खुद को सुनवाई से अलग किया है। इन मामलों की प्रकृति भी अलग-अलग रही है। इनमें सेवा संबंधी मामले, प्रतिनियुक्ति, मूल्यांकन रिपोर्ट, कथित भ्रष्टाचार की जांच से जुड़े दस्तावेज और अन्य न्यायिक कार्यवाही शामिल हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन 17 मामलों को एक ही मुकदमे का हिस्सा नहीं माना जा सकता। अलग-अलग समय पर अलग-अलग अदालतों और न्यायाधिकरणों में अलग मामले चले हैं। कई मामलों में न्यायाधीशों के अलग होने के आदेश में इसकी वजह भी स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं की गई।
सुप्रीम कोर्ट से भी जुड़े मामले
संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश रंजन गोगोई और यूयू ललित के भी सुनवाई से अलग होने का उल्लेख मिलता है।
नवंबर 2013 में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने चतुर्वेदी की उस याचिका की सुनवाई से खुद को अलग किया था….जिसमें हरियाणा में उनके कार्यकाल के दौरान सामने आए कथित भ्रष्टाचार के मामलों और उनसे जुड़े उत्पीड़न की सीबीआई जांच की मांग की गई थी। इसके बाद अगस्त 2016 में तत्कालीन न्यायमूर्ति यूयू ललित भी संबंधित कार्यवाही से अलग हुए थे।
उत्तराखंड हाई कोर्ट के न्यायाधीश भी अलग हुए
उत्तराखंड हाई कोर्ट में भी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े अलग-अलग मामलों की सुनवाई से न्यायाधीशों के अलग होने के मामले सामने आए हैं।
मई 2023 में न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल एक ऐसे मामले की सुनवाई से अलग हुए थे…जिसमें चतुर्वेदी के एम्स में मुख्य सतर्कता अधिकारी रहते हुए की गई भ्रष्टाचार विरोधी जांच से जुड़े दस्तावेजों का मामला था।
फरवरी 2024 में न्यायमूर्ति मनोज तिवारी ने उनकी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से जुड़े मामले में सुनवाई से खुद को अलग किया। इसके बाद सितंबर और अक्टूबर 2025 में न्यायमूर्ति आलोक वर्मा और न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी भी एक अवमानना मामले की सुनवाई से अलग हुए।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT में भी चतुर्वेदी से जुड़े कई मामलों में न्यायिक सदस्यों के सुनवाई से अलग होने के मामले सामने आए हैं।
फरवरी 2025 में हरविंदर ओबेरॉय और बी. आनंद की पीठ ने ऐसे मामले से खुद को अलग किया था….जो एम्स में चतुर्वेदी की मूल्यांकन रिपोर्ट को डाउनग्रेड किए जाने से संबंधित था। इसके अलावा CAT में इससे पहले भी अलग-अलग मामलों में कई न्यायिक सदस्यों के recusal का उल्लेख मिलता है।
संजीव चतुर्वेदी 2002 बैच के भारतीय वन सेवा अधिकारी हैं और हरियाणा कैडर से सेवा शुरू करने के बाद केंद्रीय प्रतिनियुक्ति तथा उत्तराखंड में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। वह एम्स दिल्ली में मुख्य सतर्कता अधिकारी यानी CVO के तौर पर भी काम कर चुके हैं।
उनके एम्स कार्यकाल को भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच के लिए विशेष रूप से चर्चा में रखा
