ट्रांसफर की चाह में शिक्षिकाओं ने तलाक का रास्ता चुना: उत्तराखंड में नया जाल

उत्तराखंड के पहाड़ी स्कूलों से मैदानी या सुगम क्षेत्रों में पदस्थापना पाने के लिए कई महिला शिक्षिकाओं ने एक अनोखा उपाय अपनाया है, जिससे शिक्षा विभाग और आम जनता चकित रह गई है।

पिछले कुछ महीनों में शिक्षा विभाग ने 1,500 से अधिक शिक्षकों के तबादले जारी किए। तबादले की सूची के सामने आने पर कई लोगों ने हैरानी जताई। राज्य में शिक्षक‑कर्मचारियों के स्थानांतरण को नियंत्रित करने वाला एक सख्त ट्रांसफर एक्ट है, जिसके तहत केवल विशेष श्रेणियों—जैसे गंभीर बीमार माता‑पिता, सास‑ससुर की देखभाल, विधवा/विधुर या तलाकशुदा—को ही मनचाहा स्थान मिल पाता है।

इन ही शर्तों का फायदा उठाते हुए कुछ महिला शिक्षिकाओं ने अपने पति से कागजी तलाक ले लिया, ताकि वे सुगम इलाकों में ट्रांसफर प्राप्त कर सकें। कई मामलों में, ट्रांसफर मिलने के बाद वही शिक्षिकाएँ फिर से कोर्ट में विवाह कर लेती हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में कई सालों तक पहाड़ों में काम करने के बाद भी उन्हें सुगम क्षेत्रों में पद नहीं मिला, इसलिए उन्होंने इस “कागजी तलाक” को एक साधन बनाया।

तलाक के अलावा, कई शिक्षिकाओं ने अपने माता‑पिता या सास‑ससुर की बीमारी का कारण बताकर भी स्थानांतरण की मांग की। इस प्रकार के बहानों से बड़ी संख्या में शिक्षिकाएँ सुगम जिलों में पदस्थापित हो गई हैं।

वहीं, विभाग में कुछ वरिष्ठ और “VIP” शिक्षक भी हैं, जिन्होंने दो‑तीन दशकों से देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर या नैनीताल जैसे शहरों में ही सेवा दी है और कभी पहाड़ी स्कूलों में नहीं गए। उनका करियर पूरी तरह से शहरी क्षेत्रों में ही बना है।

इन नई चालों को रोकने के लिए शिक्षा विभाग ने एक आदेश जारी किया है। अब जिन शिक्षिकाओं ने माता‑पिता या सास‑ससुर की बीमारी का आधार लेकर ट्रांसफर प्राप्त किया है, उन्हें स्कूल के प्रधानाचार्य के समक्ष शपथ पत्र देना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसमें वह यह पुष्टि करेंगी कि वे वास्तव में रोगी परिवार की देखभाल करेंगे। यदि जांच में यह साबित हो जाता है कि यह दावा झूठा था, तो ट्रांसफर तुरंत रद्द कर दिया जाएगा और शिक्षिका को फिर से पहाड़ी क्षेत्र में भेजा जाएगा।

इस स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि एक पर्वतीय राज्य में भी कई शिक्षक अपने कार्यस्थल को पहाड़ी इलाकों में नहीं देना चाहते। चाहे इसे व्यवस्था की कमी कहें या शिक्षिकाओं की व्यक्तिगत पसंद, यह प्रवृत्ति राज्य की शैक्षिक सेवा पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है।