सीबीआई ने आरोपियों के विरुद्ध आरोप-पत्र दायर किया

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उत्तराखण्ड का एलयूसीसी चिटफंड घोटाले

अविकल उत्तराखण्ड

नई दिल्ली। केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने शुक्रवार 10 जुलाई को उत्तराखंड के लोनी अर्बन मल्टी स्टेट क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट को-ऑपरेटिव सोसाइटी (एलयूसीसी) चिटफंड घोटाले से संबंधित मामले में देहरादून स्थित बीयूडीएस अधिनियम के विशेष न्यायालय में 18 आरोपियों/संस्था के विरुद्ध आरोप-पत्र दायर किया है।

यह आरोप-पत्र समीर अग्रवाल, शादाब हुसैन, उत्तम कुमार सिंह राजपूत, सानिया अग्रवाल (समीर अग्रवाल की पत्नी), माया सिंह राजपूत (उत्तम कुमार सिंह राजपूत की पत्नी), जितेंद्र सिंह निरंजन, दिनेश सिंह, गिरीश चंद सिंह बिष्ट, उर्मिला बिष्ट (श्री जगमोहन बिष्ट की पत्नी), जगमोहन बिष्ट, ममता भंडारी, तरुण कुमार मौर्य, गौरव उर्फ गौरव रोहिल्ला, सुशील गोखरू, किशनलाल उदयलाल जैन, पंकज कुशल सिंह जैन, राजेंद्र सिंह बिष्ट और लोनी अर्बन मल्टी स्टेट क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट को-ऑपरेटिव सोसाइटी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता, भारतीय न्याय संहिता, उत्तराखंड जमाकर्ता हित संरक्षण अधिनियम और अनियमित निक्षेप स्कीम पाबंदी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दायर किया गया है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल पीठ ने  2025 में एलयूसीसी चिटफंड घोटाले से संबंधित सभी प्राथमिकियों को सीबीआई को स्थानांतरित करने के आदेश पारित किए थे।

इनआदेशों के अनुपालन में, सीबीआई ने दिनांक 26 नवंबर 2025 को एलयूसीसी के विभिन्न पदाधिकारियों और अन्य के विरुद्ध आईपीसी, बीएनएस, उत्तराखंड जमाकर्ता हित संरक्षण अधिनियम और बड्स अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। यह मामला दर्ज करके, सीबीआई ने उत्तराखंड के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में दर्ज सभी 18 स्थानीय पुलिस प्राथमिकियों का अन्वेषण और आगे का अन्वेषण अपने हाथ में ले लिया था।

जांच से पता चला कि एलयूसीसी को वर्ष 2012 में वाजिद खान द्वारा केंद्रीय सहकारी समिति रजिस्ट्रार के यहाँ एक मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी के रूप में पंजीकृत किया गया था।
मुख्य आरोपी समीर अग्रवाल ने वर्ष 2016 में एलयूसीसी का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया और एक नया निदेशक मंडल गठित किया। समीर अग्रवाल द्वारा एलयूसीसी का कार्यभार संभालने के बाद, उत्तराखंड में स्थित इसकी 50 से अधिक शाखाओं के माध्यम से विभिन्न अनियमित जमा योजनाएं चलाई गईं।

हालांकि, उत्तराखंड में एलयूसीसी के कामकाज के लिए एनओसी उत्तराखंड के रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज द्वारा वर्ष 2017 में जारी की गई थी, लेकिन समीर अग्रवाल ने वर्ष 2016 में ही अवैध रूप से इसका संचालन शुरू कर दिया था।

चूंकि, एलयूसीसी का कोई वास्तविक व्यवसाय और कोई वास्तविक आय/लाभ नहीं था, इसलिए जमाकर्ताओं की जमा राशि का परिपक्वता भुगतान नए जमाकर्ताओं से प्राप्त नई जमा राशि से किया जा रहा था। इस प्रकार, पाया गया कि एलयूसीसी उत्तराखंड की आम जनता को धोखा देने के लिए पोंजी स्कीम चला रही थी।

जांच से पता चला कि उत्तराखंड राज्य में जनता को अभूतपूर्व पैमाने पर शिकार बनाया गया, जिसमें बड़ी संख्या में निवेशकों (लगभग 1 लाख से अधिक) को एलयूसीसी की विभिन्न अनियमित जमा योजनाओं में निवेश करने का लालच दिया गया।
इन जमाकर्ताओं द्वारा किया गया कुल निवेश/जमा लगभग ₹800 करोड़ का है। एलयूसीसी द्वारा कुछ जमाकर्ताओं को आंशिक भुगतान किया गया था, लेकिन धोखाधड़ी की कुल राशि ₹400 करोड़ से अधिक है।

अन्वेषण में यह सामने आया कि मुंबई, महाराष्ट्र निवासी मुख्य आरोपी समीर अग्रवाल एलयूसीसी के संचालन के पीछे का मास्टरमाइंड है और उसी ने इसके प्रबंधन और निर्णय लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित किया। उसने एलयूसीसी के माध्यम से अनियमित जमा योजनाएं संचालित कीं, जिसने उत्तराखंड के जमाकर्ताओं से लगभग ₹800 करोड़ एकत्र किए। उसने एलयूसीसी द्वारा एकत्र किए गए उत्तराखंड के जमाकर्ताओं के धन के गबन और हेराफेरी के लिए किशनलाल उदयलाल जैन और पंकज कुशल सिंह जैन के साथ साजिश रचकर 10 शेल (फर्जी) फर्मों के बैंक खाते खोले।

जांच से यह भी पता चला है कि वह और उसकी पत्नी  सानिया अग्रवाल विदेश फरार हो गए हैं। सीबीआई ने उनके खिलाफ नोटिस और सर्कुलर जारी किए हैं ताकि उन्हें कानूनी प्रक्रिया का सामना करने के लिए वापस लाया जा सके।
अन्वेषण से पता चला कि शादाब हुसैन, उत्तम कुमार सिंह राजपूत और दिनेश सिंह एलयूसीसी के महत्वपूर्ण पदाधिकारी थे और उनके खिलाफ भी सीबीआई द्वारा आरोप-पत्र दायर किया गया है।

इसी तरह, एलयूसीसी के चेस्ट मैनेजर नामतः तरुण कुमार मौर्य, गौरव उर्फ गौरव रोहिल्ला और ममता भंडारी, जिन्होंने विभिन्न शाखाओं द्वारा एकत्र किए गए जमाकर्ताओं के पैसे को नकदी के रूप में विभिन्न स्थानों पर भेजा और इस प्रकार बैंकिंग लेनदेन से बचे, उन्हें भी आरोप-पत्रित किया गया है।
वर्तमान आरोप-पत्र में एलयूसीसी के पदाधिकारी होने और साजिश में शामिल होने वाले कई अन्य आरोपियों को भी आरोप-पत्रित किया गया है।

जांच में पाया गया कि सुशील कुमार गोखरू ने किशनलाल उदयलाल जैन और पंकज कुशल सिंह जैन के साथ मिलकर मुंबई, महाराष्ट्र में 10 शेल फर्मों के बैंक खाते खुलवाए और उत्तराखंड के जमाकर्ताओं से एकत्र की गई धनराशि इन शेल फर्मों के बैंक खातों में स्थानांतरित कर दी गई। बाद में, इन निधियों को लेयर्ड लेनदेन के माध्यम से सैकड़ों बैंक खातों में डायवर्ट किया गया।

सीबीआई ने एक विशेष टीम का गठन किया ताकि इस मामले का अन्वेषण दैनिक आधार पर किया जा सके, आरोपियों की संपत्तियों की पहचान की जा सके और उन्हें गिरफ्तार किया जा सके।

जांच के दौरान, आरोपियों की संपत्तियों की पहचान की गई और उन्हें उत्तराखंड के सक्षम प्राधिकारी, जो कि वित्त सचिव, उत्तराखंड सरकार, देहरादून हैं, के माध्यम से कुर्क कराने की कार्रवाई की गई।
आरोपियों से संबंधित उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में 39 संपत्तियों की पहचान की गई थी और बीयूडीएस अधिनियम, 2019 के तहत कुर्की की कार्यवाही शुरू करने के लिए सीबीआई द्वारा सक्षम प्राधिकारी को संदर्भित किया गया था।

इन 39 संपत्तियों में से अब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा उचित प्रक्रिया का पालन करने के बाद 29 संपत्तियों के संबंध में अनंतिम कुर्की आदेश जारी किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, सक्षम प्राधिकारी द्वारा इन 29 अनंतिम रूप से कुर्क की गई संपत्तियों की पुष्टि के लिए नामित न्यायालयों के समक्ष आवेदन भी दायर किए जा रहे हैं। शेष 10 संपत्तियों के संबंध में, सक्षम प्राधिकारी अनंतिम कुर्की की कार्यवाही शुरू करने की प्रक्रिया में हैं।
जांच के दौरान, सीबीआई द्वारा सात आरोपियों तरुण कुमार मौर्य, ममता भंडारी, गौरव उर्फ गौरव रोहिला, राजेंद्र सिंह बिष्ट, सुशील कुमार गोखरू, किशनलाल उदयलाल जैन और पंकज कुशल सिंह जैन को गिरफ्तार किया गया।  सभी आरोपी वर्तमान में न्यायिक हिरासत में हैं।

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