देहरादून की डिफेंस कॉलोनी में 250 करोड़ रुपये का भूमि घोटाला: 16 पूर्व सैन्य अधिकारियों पर FIR, हरित क्षेत्रों की बिक्री का मामला

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्थित, राज्य की सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक डिफेंस कॉलोनी से एक चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है, जिसने न केवल प्रशासनिक स्तरों पर हलचल मचाई है, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण के प्रति समाज को भी गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया है। यह मामला 250 करोड़ रुपये के कथित भूमि घोटाले से जुड़ा हुआ है, जिसमें 16 पूर्व सैन्य अधिकारियों के नाम जोड़े गए हैं। यह खुलासा तब हुआ जब पूर्व कर्नल रमेश प्रसाद सिंह ने आरोप लगाया कि कॉलोनी के उन हिस्सों को, जिन्हें शायद ही कोई निजी हितों के लिए प्रभावित होने की उम्मीद करता था, बेधड़क तरीके से प्राइवेट प्लॉट्स में काट दिया गया। यह मामला इसलिए और भी गंभीर है क्योंकि डिफेंस कॉलोनी का निर्माण वर्ष 1968 में रिटायर्ड सैन्य अफसरों और उनके परिवारों के लिए एक शांत, स्वच्छ और हरियाली से घिरा माहौल प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया था, जहां कुल क्षेत्रफल का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ खुले मैदानों, पार्कों और सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखा गया था।

शिकायतकर्ता के अनुसार, दशकों भर से अनगुंत रहने वाली यह समस्या अब एक बड़े आर्थिक घोटाले की शक्ल ले चुकी है। दावा किया गया है कि सोसाइटी के पूर्व प्रबंधन और विभिन्न समयों पर नियुक्त हुए सचिवों ने अपने पदों का दुरुपयोग किया और सार्वजनिक जमीनों को गैरकानूनी तरीके से निजी प्लॉट्स में बदल दिया। इस प्रक्रिया के बाद इन जमीनों की खरीद-फरोख्त शुरू हुई, जिससे करोड़ों रुपये के लेन-देन हुए हैं। यदि इन अवैध रूप से बनी आलीशान इमारतों और बेची गई जमीनों की कुल कीमत का हिसाब लगाया जाए, तो यह घोटाला 250 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर जाता है। इस घटनाक्रम से न केवल आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि डिफेंस कॉलोनी के एक लाख वर्गमीटर से अधिक हरित क्षेत्र (Green Belt) भी प्रभावित हुए हैं, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है।

इस पूरे मामले की जांच के लिए 11 फरवरी 2025 को नेहरू कॉलोनी थाने में 16 पूर्व सैन्य अधिकारियों के खिलाफ बकायदा FIR दर्ज कराई गई है। शिकायतकर्ता पूर्व कर्नल रमेश प्रसाद सिंह ने इस घटनाक्रम को लेकर मुख्यमंत्री और पर्यावरण मंत्रालय को भी एक विस्तृत शिकायत भेजी है, जिसमें उन्होंने यह सबूत प्रस्तुत किए हैं कि कैसे सोसाइटी पर काबिज कुछ लोगों ने नियमों की धज्जियां उड़ाकर अवैध लाभ अर्जित किया। हालांकि, प्रशासनिक जवाबदारी का सवाल भी उठ खड़ा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गढ़वाल मंडल आयुक्त और MDDA के अध्यक्ष ने इस मामले पर पहले से ही संज्ञान लिया था और कार्रवाई के लिए सख्त डेडलाइन तय की गई थी। लेकिन आरोप है कि निचले स्तर पर बैठे कुछ अधिकारियों ने इस आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया, जिसके परिणामस्वरूप तय समय बीत गया और कार्रवाई के बजाय सिर्फ फाइलों का इधर-उधर घूमना जारी रहा।

अब शिकायतकर्ता ने शहरी विकास और पर्यावरण विभाग के स्तर पर एक जॉइंट लीगल कमेटी गठित करने की मांग की है। उनकी जोरदार मांग है कि जो भी अवैध संपत्तियां बेची गई हैं, उनके प्रस्ताव तुरंत निरस्त किए जाएं और पर्यावरण कानूनों के तहत दोषियों को कड़ी सजा दी जाए। इसके अलावा, नेहरू कॉलोनी थाने में दर्ज मुकदमे में नामजद किए गए 16 पूर्व अधिकारियों से पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की ‘पाई-पाई’ वसूली की भी मांग उठाई गई है। यह घटना अब एक बड़ा सामाजिक और कानूनी सवाल बना हुआ है कि वे जमीनें, जिन्हें विशेष रूप से सार्वजनिक उपयोग और हरियाली के लिए सुरक्षित रखा गया था, निजी हाथों तक कैसे पहुंच पाईं। आगामी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए ये गंभीर आरोप कितनी हद तक सही साबित होते हैं और प्रशासन इस 250 करोड़ रुपये के कथित घोटाले को रोकने के लिए कितनी गंभीरता दिखाता है।