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राजाजी‑फूलों की घाटी में इको‑सेंसेटिव जोन की रूपरेखा, पर्यावरण‑सुरक्षा और स्थानीय हितों का संतुलन

उत्तराखंड के दो विश्व‑प्रसिद्ध वन्यजीव अभयारण्यों—राजाजी नेशनल पार्क और फूलों की घाटी राष्ट्रीय पार्क—के आस‑पास इको‑सेंसेटिव जोन (ESZ) की घोषणा की तैयारी तेज़ हो गई है। यह कदम वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को औद्योगिक अतिक्रमण, प्रदूषण और अनियंत्रित निर्माण से बचाने के उद्देश्य से उठाया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर कई अभयारण्यों में लागू ESZ मॉडल को ध्यान में रखकर, सरकार ने इन दोनों पार्कों के चारों ओर 10 किमी तक के क्षेत्र को संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की दिशा में कार्य शुरू किया है। इस संदर्भ में, गुरुवार को उत्तराखंड सचिवालय में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसका संचालन प्रमुख सचिव (पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन) आर.के. सुधांशु ने किया।

बैठक में वन सचिव सी. रविशंकर, पीसीसीएफ (वन्यजीव) की नीना ग्रेवाल, सीसीएफ के साकेत, नंदा देवी बायोस्फीयर रिज़र्व के निदेशक पंकज कुमार, केदारनाथ के डीएफओ रजत सुमन, अपर सचिव अभिषेक रुहेला, तथा पर्यटन विभाग की अपर निदेशक पूनम चंद सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। चर्चा का मुख्य बिंदु ESZ के दायरे को निश्चित करना, जोनल मास्टर प्लान तैयार करना, निगरानी समिति का गठन और किन कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा, इन सब पर विस्तृत विचार-विमर्श था। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि ESZ के प्रस्ताव में जमीन की बनावट, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और स्थानीय समुदायों की जरूरतों को संतुलित रूप से शामिल किया जाए, ताकि संरक्षण के साथ‑साथ स्थानीय जनजीवन और छोटे‑मोटे व्यवसायों को नुकसान न पहुँचे।

राजाजी नेशनल पार्क से जुड़े ESZ के कार्यान्वयन में व्यावहारिक कठिनाइयों को शीघ्र सुलझाने के लिए प्रमुख सचिव ने अगली कैबिनेट बैठक में आवश्यक दिशा‑निर्देश माँगने का प्रस्ताव रखा। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार कानूनी सलाह लेकर राज्य सरकार की स्थिति पर एक हफ्ते के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश भी दिया गया। फूलों की घाटी राष्ट्रीय पार्क की समीक्षा में अधिकारियों को विशेष रूप से इस नाजुक क्षेत्र की पर्यटकों की सहन‑शक्ति (Carrying Capacity) पर ध्यान देने की चेतावनी दी गई, जिससे भविष्य में अनियंत्रित भीड़भाड़ से बचा जा सके।

अंत में, प्रमुख सचिव आर.के. सुधांशु ने दोहराते हुए कहा, “इको‑सेंसेटिव जोन बनाते समय प्रकृति की रक्षा और स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं के बीच सही संतुलन बनाना अनिवार्य है। पर्यावरण को बचाते हुए ग्रामीणों और व्यापारियों के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।” इस दिशा में केंद्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB व SPCB) के स्तर पर आवश्यक कागजी कार्यवाही पूरी करने, तथा जिलाधिकारियों से जमीनी रिपोर्ट एकत्रित करने के निर्देश भी जारी किए गए।

Original Title: राजाजी और फूलों की घाटी में बनेंगे इको-सेंसेटिव जोन, पर्यावरण संग स्थानीय हितों का भी रखा जाएगा ख्याल

Original Content: उत्तराखंड के दो विश्व प्रसिद्ध जंगलों ‘राजाजी नेशनल पार्क’ और ‘फूलों की घाटी राष्ट्रीय पार्क’ को अब और अधिक सुरक्षित बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। पर्यावरण की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार दोनों नेशनल पार्कों के आसपास ‘ईको-सेंसेटिव जोन’ (Eco-Sensitive Zone) बनाने जा रही है।

राजाजी और फूलों की घाटी में बनेंगे इको-सेंसेटिव जोन

इसी सिलसिले में गुरुवार को सचिवालय में एक अहम बैठक बुलाई गई। बैठक की अध्यक्षता प्रमुख सचिव (पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन) आर.के. सुधांशु ने की। इस दौरान पार्क के आसपास के इलाके का दायरा तय करने, जोनल मास्टर प्लान बनाने, निगरानी कमेटी गठित करने और यह तय करने पर लंबी चर्चा हुई कि इन इलाकों में क्या काम किए जा सकेंगे और किन पर पूरी तरह पाबंदी रहेगी। बैठक में वन सचिव सी. रविशंकर, पीसीसीएफ (वन्यजीव) नीना ग्रेवाल, सीसीएफ साकेत, नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के निदेशक पंकज कुमार, केदारनाथ के डीएफओ रजत सुमन, अपर सचिव अभिषेक रुहेला, और पर्यटन विभाग की अपर निदेशक पूनम चंद समेत कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

क्या होता है इको-सेंसेटिव जोन?

राष्ट्रीय उद्यानों या वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास 10 किलोमीटर तक के दायरे को ईको-सेंसेटिव जोन घोषित किया जाता है। इसका मुख्य मकसद जंगलों के आसपास भारी औद्योगिक गतिविधियों, प्रदूषण और अंधाधुंध निर्माण को रोकना होता है, ताकि वन्यजीवों का प्राकृतिक घर सुरक्षित रहे।

कैबिनेट से लिया जाएगा मार्गदर्शन, कोर्ट के निर्देशों का होगा पालन

राजाजी नेशनल पार्क से जुड़े ईको-सेंसेटिव जोन के मुद्दों पर प्रमुख सचिव ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इससे जुड़ी तमाम व्यावहारिक समस्याओं को जल्द सुलझाया जाए। इसके लिए अगली कैबिनेट बैठक में सरकार से जरूरी दिशा‑निर्देश लिए जाएंगे। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक कानूनी सलाह लेकर राज्य सरकार की स्थिति पर एक हफ्ते के भीतर रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।

फूलों की घाटी में पर्यटकों की क्षमता का रखा जाएगा ध्यान

फूलों की घाटी राष्ट्रीय पार्क की समीक्षा के दौरान अफसरों को निर्देश दिए गए कि इस बेहद नाजुक इलाके में पर्यटकों की आवाजाही और वहां की सहने की क्षमता (Carrying Capacity) का खास ध्यान रखा जाए। प्रमुख सचिव ने कहा कि डीएम, पर्यटन विभाग और अन्य संबंधित महकमों से रिपोर्ट लेकर जल्द से जल्द एक मजबूत प्रस्ताव तैयार किया जाए।

पर्यावरण संरक्षण और जनभावनाओं में रहेगा संतुलन

प्रमुख सचिव आर.के. सुधांशु ने इस बात पर जोर दिया कि ईको‑सेंसेटिव जोन का प्रस्ताव तैयार करते वक्त जमीन की बनावट, पर्यावरण की संवेदनशीलता और स्थानीय जरूरतों का पूरा ध्यान रखा जाए। उन्होंने अधिकारियों को साफ निर्देश दिए: “ईको‑सेंसेटिव जोन बनाते समय प्रकृति की सुरक्षा और स्थानीय लोगों की जरूरतों के बीच सही संतुलन होना चाहिए। पर्यावरण तो बचाना ही है, साथ ही स्थानीय ग्रामीणों और कारोबारियों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।” इसके अलावा, केंद्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB व SPCB) के स्तर पर जरूरी कागजी प्रक्रिया पूरी करने और संबंधित जिलाधिकारियों से जमीनी रिपोर्ट हासिल करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।