उत्तराखंड की स्वास्थ्य प्रणाली ने फिर एक बार एक छात्रा की जान ले ली। पौड़ी के वीर चंद्र सिंह गढ़वाली भरसार कैंपस में पढ़ रही मधु यादव, जो बीएससी के अंतिम वर्ष में थी, को समय पर बुनियादी उपचार नहीं मिल सका और उसकी मृत्यु हो गई। इस त्रासदी की जड़ में कौन जिम्मेदार है—विश्वविद्यालय का स्वास्थ्य विभाग, राज्य की रेफ़रल प्रणाली, या दोनों की लापरवाही?
**छात्राओं ने विश्वविद्यालय पर आरोप लगाए**
सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में कई छात्राएँ वीर चंद्र सिंह गढ़वाली कृषि और औद्यानिकी विश्वविद्यालय पर आरोप लगाते दिखती हैं। उनका कहना है कि मधु यादव की तबीयत अचानक बिगड़ गई, जबकि वह कैंपस की डिस्पेंसरी में उपचार ले रही थी।
**मधु की बीमारी की अवधि**
पंतनगर की रहने वाली मधु पिछले तीन‑चार दिनों से गंभीर रूप से बीमार थी। उसके सहपाठियों का कहना है कि उन्होंने विश्वविद्यालय प्रबंधन से अनुरोध किया कि कैंपस में ही उसकी जाँच‑परख कर ली जाए, पर प्रशासन ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया।
**विश्वविद्यालय की स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल**
विश्वविद्यालय अक्सर बड़े‑बड़े दावे करता है, पर जब किसी छात्रा की जान बचाने की बात आती है, तो उसकी बुनियादी सुविधाएँ, जैसे वेंटिलेटर, भी अनुपलब्ध रह जाती हैं। यह समस्या केवल भरसार कैंपस तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को उजागर करती है, जिसे अक्सर चमचमाते विज्ञापनों से छुपाया जाता है।
**रेफ़रल प्रक्रिया में गड़बड़ी**
रिपोर्टों के अनुसार, मधु की स्थिति बिगड़ने पर उसे पहले पाबो अस्पताल और फिर जिला अस्पताल, श्रीनगर भेजा गया। अंत में उसे उत्तराखंड के एएमएस, ऋषिकेश में रेफ़र किया गया। लेकिन ऋषिकेश की ओर ले जाते समय ही मधु ने अपनी जिंदगी की लड़ाई हार दी।
**पाबो और श्रीनगर में डॉक्टरों की कमी**
भरसार विश्वविद्यालय के छात्राओं का कहना है कि पाबो और श्रीनगर दोनों अस्पतालों में डॉक्टर नहीं थे। फिर भी विश्वविद्यालय ने मधु को वहीँ छोड़ दिया, जहाँ उसे तुरंत उपचार नहीं मिल सका।
**राज्य की रेफ़रल प्रणाली पर तीखा प्रहार**
उत्तरी भारत में रेफ़रल सिस्टम की खामियों के कारण मधु यादव को लगातार इंतज़ार और यात्रा करनी पड़ी, जिससे उसकी हालत और बिगड़ गई। स्वास्थ्य मंत्री की नज़र में इस समस्या की गंभीरता नहीं दिखती, और पहाड़ों में घटित ऐसी घटनाएँ अक्सर अनसुनी रह जाती हैं।
**कॉलेज में बुनियादी चिकित्सा सुविधा की कमी**
यदि भरसार विश्वविद्यालय में छात्रों को बुनियादी चिकित्सा सुविधा नहीं मिल रही, तो ऐसे संस्थान कैसे संचालित हो रहे हैं? यह सवाल उठता है कि कौन-से नियम या निरीक्षण निकाय ऐसी बड़ी यूनिवर्सिटी को बिना पूर्ण मेडिकल बैकअप के काम करने की अनुमति दे रहे हैं। अंततः, इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को तुरंत सुधार की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।
