उत्तराखंड के वोटर‑लिस्ट रीविज़न से उभरी नई राजनीतिक उलझन: कौन झेलेगा भारी दांव?

कोलकाता स्थित स्वतंत्र शोध संस्था सबर इंस्टीट्यूट ने हाल ही में “SIR Uttarakland Preliminary Report 2026” नामक विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया, जिसमें उत्तराखंड में चल रहे वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के प्रभावों की गहन जांच की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, कुल 70 विधानसभा सीटों में से 45 सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2022 के चुनाव में जीत के अंतर से कई गुना अधिक है, जिससे आगामी चुनावों में राजनीतिक समीकरणों को उलट‑पुलट करने की संभावना बनती है। अब तक 8,07,410 नामों को सूची से हटाया गया, जिनमें 52 % महिलाएँ (4,19,808) और 48 % पुरुष हैं, जिससे महिला मतदाताओं पर विशेष दबाव स्पष्ट हो रहा है, खासकर धौलती, धारचूला, केदारनाथ और पुरोला जैसे पहाड़ी जिलों में जहाँ कटौती की दर 56‑58 % तक पहुँची है।

रिपोर्ट ने यह भी उजागर किया कि मैदानी औद्योगिक जिलों और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में नाम कटने की दर सबसे अधिक है। देहरादून (28.4 %) और उधम सिंह नगर (26.9 %) जैसे क्षेत्रों में “अनुपस्थित या लापता” श्रेणी के तहत सबसे अधिक नाम हटाए गए, जहाँ प्रमुख उपनामों में अहमद, खान, बेगम, हुसैन और जहाँ शामिल हैं। ऊधम सिंह नगर में मुस्लिम जनसंख्या 22.6 % है, परंतु वोट कटने की दर 12.9 % तक पहुँची, वही हरिद्वार में 34.3 % मुस्लिम जनसंख्या के साथ कटौती 8.4 % रही। इन आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि मुस्लिम‑बहुल मैदानी सीटों में कटे वोटों का असर कांग्रेस और बसपा दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

अनुसूचित जाति‑बहुल जिलों में प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा; बागेश्वर, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जैसे क्षेत्रों में कटौती दर केवल 6.9‑7.4 % रही। फिर भी, राज्य‑व्यापी 40 थर्ड‑जेंडर मतदाताओं के नाम भी हटाए गए, मुख्यतः राजपुर रोड, रुड़की, बीएचईएल रानीपुर और हल्द्वानी जैसे शहरी केंद्रों में। कुल मिलाकर, शीर्ष 10 सबसे अधिक कटे वोटों वाले विधानसभा क्षेत्रों में देहरादून, ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार के मैदानी और शहरी सीटें प्रमुख हैं, जहाँ काशीपुर, ऋषिकेश, धर्मपुर, सितारगंज और किच्छा जैसे क्षेत्रों में “लापता या अनुपस्थित” वर्गीकरण के कारण बड़ी संख्या में मतदाता सूची से बाहर हुए हैं।

सबर इंस्टीट्यूट की यह रिपोर्ट इस बात की चेतावनी देती है कि SIR प्रक्रिया ने मतदाता सूची को पुनः व्यवस्थित करते हुए कई सामाजिक समूहों—विशेषकर महिलाएँ, मुस्लिम‑बहुल और मैदानी श्रमिक वर्ग—पर असमान दबाव डाला है। यदि इस पुनः‑समीक्षा को ठीक से सत्यापित नहीं किया गया, तो आगामी चुनावों में इन कटे वोटों का पुनर्वितरण या पुनः‑पंजीकरण राजनीतिक संतुलन को गहराई से बदल सकता है, चाहे वह भाजपा, कांग्रेस या बसपा के दावों पर ही क्यों न पड़े।

Original Title: विशेष : भाजपा, कांग्रेस या बसपा किसके जनाधार पर SIR की मार ?, इस रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

Original Content: देहरादून। प्रदेश में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) आखिर किस पार्टी को महंगा पड़ेगा। किस पार्टी के जनाधार पर चोट लगेगी ? यह सवाल SIR शुरू होने से ही प्रदेश को मथ रहा है कि इसका फायदा या नुकसान किस पार्टी को होगा ? भाजपा या कांग्रेस ?

SIR Uttarakhand Preliminary Report 2026 में हुआ खुलासा

कोलकाता स्थित सबर इंस्टीट्यूट (Sabar Institute) ने कुछ अरसा पहले उत्तराखंड में जारी एसआईआर पर अध्ययन रिपोर्ट ‘SIR Uttarakhand Preliminary Report 2026’ जारी की है। सबर इंस्टीट्यूट कोलकाता स्थित एक स्वतंत्र शोध संस्थान है जो भारत में सामाजिक असमानता, चुनावी डेटा विश्लेषण (एसआईआर-ऑडिट), और जनहित के मुद्दों पर डेटा-आधारित अध्ययन रिपोर्टें प्रकाशित करता है।

सबर इंस्टीट्यूट (रिसर्च व थिंक-टैंक) की अध्ययन रिपोर्ट कहती है कि मतदाता सूची के इस शुद्धिकरण अभियान का असर सभी वर्गों और क्षेत्रों पर एक समान नहीं पड़ा है। मैदानी औद्योगिक जिलों, महिला मतदाताओं और मुस्लिम बहुल इलाकों में नाम कटने की दर सबसे अधिक देखी गई है, जबकि पहाड़ी और अनुसूचित जाति बहुल जिलों में यह प्रभाव तुलनात्मक रूप से कम रहा है। वोट कटने का यह आंकड़ा इसलिए भी अहम है क्योंकि माना जाता है कि जहां डेढ़ दशक से महिलाओ का बड़ा हिस्सा भाजपा का रुख करता रहा है। वहां मुस्लिम, दलित कांग्रेस का जनाधार माना जाता है।

45 विधानसभा सीटों पर पड़ेगा असर

इस रिपोर्ट ने राज्य की भावी राजनीति और चुनावी प्रक्रियाओं पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब यह रिपोर्ट तैयार की गई थी तब तक उत्तराखंड की सभी 70 विधानसभा सीटों से कुल 8,07,410 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके थे। सबर इंस्टीट्य़ूट की रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह है कि उत्तराखंड की 70 में से 45 विधानसभा सीटों पर काटे गए वोटों की संख्या 2022 के पिछले चुनाव के जीत के अंतर से कहीं अधिक है।

SIR का प्रदेश की महिला मतदाताओं पर भारी असर

रिपोर्ट के अनुसार, राज्यभर में जितने भी नाम सूची से हटाए गए हैं, उनमें 52 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की है (4,19,808 महिला मतदाता), जबकि पुरुषों का प्रतिशत 48 प्रतिशत है। विशेष रूप से पर्वतीय जिलों में महिलाओं के वोट कटने की दर चौंकाने वाली है। यह धनौल्टी में 58.1 प्रतिशत, धारचूला में 57.6 प्रतिशत, केदारनाथ में 57.3 प्रतिशत और पुरोला: 56.8 प्रतिशत है। पहाड़ी क्षेत्रों से पुरुषों का बड़े पैमाने पर रोजगार की तलाश में पलायन होता है, जिससे प्रशासनिक सत्यापन और मतदाता सूची अपडेट करने का पूरा दबाव स्थानीय स्तर पर मौजूद महिलाओं पर आ जाता है।

मुस्लिम बहुल क्षेत्रों और उपनामों का ट्रेंड

2011 की जनगणना से जिलेवार आंकड़ों का मिलान करने पर मुस्लिम आबादी के अनुपात और वोट कटने की दर के बीच एक मजबूत सकारात्मक संबंध पाया गया है। कमजोर दस्तावेजी आधार के आधार पर ‘अनुपस्थित या लापता’ की श्रेणी के तहत मैदानी और मुस्लिम आबादी वाले जिलों(जैसे देहरादून में 28.4 प्रतिशत और ऊधम सिंह नगर में 26.9 प्रतिशत) में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए हैं। हटाए गए नामों के डेटाबेस में अली, खान, अहमद, बेगम, हुसैन, और जहां जैसे उपनाम प्रमुखता से शामिल हैं। रिपोर्ट में काटे गए कुल 8,07,410 नामों के उपनाम (Surnames) का विश्लेषण किया गया, जिसमें अहमद 5,719 , खान 2,960 , बेगम 2,792, हुसैन 2,229 और जहाँ जैसे 2,095 उपनामों पर असर पड़ा है।

रिपोर्ट में विशेष रूप से रेखांकित किया गया है कि अनुपस्थित या अनट्रेसेबल’ श्रेणी में वोट कटने की दर मुस्लिम आबादी वाले मैदानी जिलों (देहरादून में 28.4% तथा उधम सिंह नगर में 26.9%) में सबसे अधिक पाई गई है। रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि जिला स्तर पर ये केवल सांख्यिकीय पैटर्न दर्शाते हैं और आगे मतदान केंद्र स्तर पर विस्तृत जांच की आवश्यकता की ओर इशारा करते हैं।

जिन जिलों में मुस्लिम आबादी अधिक , वहाँ वोट कटने की दर अधिक

रिपोर्ट के अनुसार जिन जिलों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत अधिक है, वहाँ वोट कटने की दर अधिक