हिमालय से खिलवाड़: नेपाल की त्रासदी से हमें क्या सीखना चाहिए

Stay connected via Google News
Follow us for the latest updates and guides.
Add as preferred source on Google

**
नेपाल के नुवाकोट और धाडिंग जिलों में हाल ही में आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। भोटे कोशी और त्रिशूली नदी में आए उफान से अब तक 260 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 1,000 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें भारत के भी 133 लोग शामिल हैं।

यह घटना केवल एक बाढ़ नहीं, बल्कि हिमालय के बदलते मौसम और ग्लेशियरों के पिघलने की बड़ी समस्या का संकेत है। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानों के ढहने से नदी में अचानक मलबा और तेज़ प्रवाह उत्पन्न हुआ। ग्लेशियल झील के फटने या भूकंपीय गतिविधि जैसी संभावनाओं की भी जांच चल रही है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान ग्लेशियर के ढहने को तेज़ कर रहा है। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि आपदा से एक दिन पहले इस क्षेत्र में बर्फ का कवर तेज़ी से घटा था, जो इस बात का संकेत है कि गर्मी ने बर्फ को पिघलाया और एवलांच को बढ़ावा दिया। हालांकि, बादलों के कारण अभी पूरी सैटेलाइट छवियां उपलब्ध नहीं हैं; साफ़ तस्वीरें मिलने पर बाढ़ के सटीक कारणों का पता और स्पष्ट होगा।

चीन के तिब्बत क्षेत्र से निकलने वाली नदियां भारत, नेपाल और कई देशों की जीवनरेखा हैं। इसलिए सीमा‑पार नदियों, ग्लेशियरों और जलाशयों की निगरानी केवल एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र की साझा ज़िम्मेदारी है।

हर आपदा को डैम या जलाशय के फटने से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है, परंतु जहाँ जलविद्युत परियोजना के नीचे बस्तियां हों, क्षेत्र भूकंपीय रूप से संवेदनशील हो, ऊपर ग्लेशियर या संभावित GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का खतरा हो और विशेषज्ञ गंभीर आपत्ति दर्ज कर चुके हों—वहां केवल विकास के नाम पर परियोजना को आगे बढ़ाना समझदारी नहीं है।

जलविद्युत और विकास आवश्यक हैं, पर जीवन से बड़ा कोई विकास नहीं। अब समय आ गया है कि हिमालयी क्षेत्रों में हर बड़ी परियोजना के लिए केवल सामान्य पर्यावरणीय मंजूरी नहीं, बल्कि ग्लेशियर, भूकंप, भूस्खलन, GLOF, अचानक बाढ़ और जलवायु परिवर्तन—इन सभी को एक साथ ध्यान में रखकर वैज्ञानिक जोखिम आकलन किया जाए। छोटी‑सी अस्थिरता भी नीचे बसे हजारों लोगों के लिए बड़ी आपदा बन सकती है।

प्रकृति हमें बार‑बार चेतावनी दे रही है। सवाल यह है कि हम इन चेतावनियों को सुनेंगे या अगली त्रासदी का इंतजार करेंगे? आज जरूरत है—जोखिम भरे विकास की नहीं, सुरक्षित विकास की। केवल परियोजनाओं की नहीं, पहाड़ों की वहन क्षमता की, और सबसे बढ़कर—मानव जीवन की सुरक्षा।

Stay connected via Google News
Follow us for the latest updates and guides.
Add as preferred source on Google
×