देहरादून में सबसे अधिक वन भूमि हुई हस्तांतरित

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दून के पर्यावरण पर लगातार पड़ रही मार

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों से अधिक समय में विकास परियोजनाओं के लिए 46 हजार हेक्टेयर से अधिक वन भूमि का हस्तांतरण किया जा चुका है।
यह औसतन प्रतिदिन लगभग पांच हेक्टेयर वन क्षेत्र के नुकसान के बराबर है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि राज्य के कुल वन भूमि हस्तांतरण का 47 प्रतिशत हिस्सा अकेले देहरादून जिले में हुआ है।

सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में देहरादून की हिस्सेदारी केवल लगभग छह प्रतिशत है, लेकिन विकास कार्यों के लिए सर्वाधिक वन भूमि इसी जिले से हस्तांतरित की गई है। इन परियोजनाओं में सड़क निर्माण, खनन और अन्य आधारभूत विकास कार्य शामिल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि देहरादून घाटी पहले भी पर्यावरणीय संकट झेल चुकी है। 1980 के दशक में चूना पत्थर के व्यापक खनन ने दून घाटी की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद वर्ष 1989 में दून घाटी को देश के शुरुआती पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया) में शामिल किया गया था।

अब एक बार फिर तेजी से बढ़ते शहरीकरण और विकास परियोजनाओं के कारण दून घाटी के जंगलों और हरित क्षेत्र पर अभूतपूर्व दबाव बन रहा है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो आने वाले वर्षों में देहरादून को जल संकट, जैव विविधता में कमी, बढ़ते तापमान और प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि विकास आवश्यक है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि दून घाटी की प्राकृतिक पहचान और पारिस्थितिकी सुरक्षित रह सके।

प्रमुख तथ्य

  • पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड में 46,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित।
  • औसतन प्रतिदिन लगभग 5 हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास कार्यों के लिए परिवर्तित।
  • राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में देहरादून की हिस्सेदारी केवल 6 प्रतिशत।
  • विकास कार्यों के लिए हस्तांतरित कुल वन भूमि का 47 प्रतिशत अकेले देहरादून जिले में।
  • सड़क, खनन और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए सबसे अधिक वन भूमि दून घाटी में गई।

क्यों बढ़ी चिंता?

  • हरित क्षेत्र में लगातार कमी।
  • जैव विविधता और वन्यजीवों पर बढ़ता दबाव।
  • जल स्रोतों और भूजल पुनर्भरण पर असर।
  • तापमान में वृद्धि और शहरी ऊष्मा द्वीप (हीट आइलैंड) प्रभाव का खतरा।
  • भूस्खलन, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की आशंका में वृद्धि।

पर्यावरणविदों की मांग

  • वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाया जाए।
  • संवेदनशील क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की स्वतंत्र पर्यावरणीय समीक्षा हो।
  • प्रत्येक परियोजना में प्रभावी प्रतिपूरक वनीकरण और उसकी निगरानी सुनिश्चित की जाए।
  • विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलित नीति अपनाई जाए, ताकि दून घाटी की पारिस्थितिकी और प्राकृतिक विरासत सुरक्षित रह सके।

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