ज्योलीकोट की मौतों पर हाईकोर्ट का गुस्सा: 70% पानी फेल, अधिकारियों की झूठी रिपोर्ट केस में पकड़ी गई, सीएम धामी ने किया ऑडिट का आदेश

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में ज्योलीकोट, चोपड़ा, खुर्पाताल और सड़ियाताल इलाकों में दूषित पेयजल के कारण बढ़ती मौतों और बीमारियों का मामला अब न्यायिक और राजनीतिक तूफान में बदल गया है। स्थानीय लोगों के लगातार शिकायतों को नजरअंदाज करने और ‘सब सामान्य’ का झूठ बोलने के बाद, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जल संस्थान के अधिकारियों को जबरदस्त फटकार लगाई है। कोर्ट के सामने पेश की गई असल जांच रिपोर्ट ने अधिकारियों के दावों को झूठ साबित कर दिया, जिससे पूरा मामला गर्म हो गया है। इस घटनाक्रम में न केवल राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही का सवाल उठा है, बल्कि जल संस्थान के सीनियर केमिस्ट योगेंद्र पाल के इस्तीफे ने इस अहम घटनाक्रम को और गहराई दी है।

मामले की गंभीरता समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि दुर्गापुर पेयजल संयंत्र, जो इन इलाकों को पानी की आपूर्ति करता है, के ऊपर सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बना हुआ है। महीनों से इस सीवर प्लांट का बदबूदार और दूषित पानी रीस-रीसकर सीधे पीने के पानी की मेन लाइन में मिल रहा था। स्थानीय लोग 20 जून से ही झाग वाले और बदबूदार पानी की शिकायत कर रहे थे, जिससे बच्चों और वयस्कों में उल्टी-दस्त और गंभीर पेट के संक्रमण की समस्या शुरू हो गई। लगभग दो महीनों तक अधिकारियों की पूरी बेफ़िक्री और अनदेखी के बाद, जब मौतें होने लगीं और जन-आक्रोश सड़कों पर उतर आया, तब भी अधिकारियों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। अंततः 27 अगस्त को ही दूषित पानी की लाइन को काटा जा सका, जिस तक में ज्योलीकोट की 26 वर्षीय नीमा जोशी, सड़ियाताल के गाजे गांव के 16 वर्षीय रितेश और स्थानीय महिला अनीता ने अपनी जान गंवा दी। इन मौतों के अलावा, 200 से अधिक लोग गंभीर संक्रमण की चपेट में आ गए हैं।

हाईकोर्ट के सामने जब मामला पहुंचा, तो जल संस्थान के अधिकारियों ने दावा किया कि स्थिति सामान्य है और पानी की आपूर्ति ठीक चल रही है। हालांकि, जब कोर्ट के सामने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPCB) और स्वास्थ्य विभाग की असल जांच रिपोर्ट पेश की गई, तो अधिकारियों का झूठ पकड़ा गया। रिपोर्ट के अनुसार, पानी के 10 सैंपल में से 7 सैंपल फेल पाए गए, जबकि स्वास्थ्य विभाग द्वारा लिए गए 5 सैंपल में से 4 ऐसे थे जो इस्तेमाल के लायक ही नहीं थे। इस चौंकाने वाले आंकड़े के बाद हाईकोर्ट का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। कोर्ट ने अधिकारियों से सवाल पूछा कि दूषित पानी रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए, जिसके जवाब में अधिकारों के पास कोई ठोस तर्क नहीं था।

न्यायालय ने इस घोर लापरवाही के ख़िलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए जांच कमेटी में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को शामिल करने का आदेश दिया है। साथ ही, उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद वर्धन को कड़ा निर्देश दिया गया है कि वे एक हफ्ते के भीतर मामले की विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करें। इसी अहम मोड़ पर, नैनीताल जल संस्थान के लैब के सीनियर केमिस्ट योगेंद्र पाल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने इस्तीफे में लिखा कि विभागीय दबाव और ज्योलीकोट में घटे इस दर्दनाक प्रकरण से वे बेहद व्यथित हैं, जिसके चलते वे सेवा से अपना रिश्ता तोड़ रहे हैं।

राज्य सरकार ने भी इस घटनाक्रम की गंभीरता को समझते हुए संज्ञान लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पूरे उत्तराखंड में पेयजल और सीवर लाइनों के तुरंत ऑडिट कराने के सख्त निर्देश दिए हैं। 15 दिन के अंदर ऑडिट रिपोर्ट तलब करते हुए सीएम धामी ने दो टूक कहा है कि हर घर तक सुरक्षित पानी पहुंचाना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में लीकेज या पानी की गुणवत्ता से जुड़ी कोई शिकायत मिलती है और उस पर तुरंत प्रभावी कार्रवाई नहीं की जाती, तो क़ानून के तहत जवाबदेह अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा।