कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी रैली के दौरान मंच शुद्धिकरण को लेकर उठा विवाद, राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। सवाल यह उठता है कि जब ये मुद्दा धीरे-धीरे फीका पड़ रहा था, तो कांग्रेस ने फिर से भाजपा को घेरने की कोशिश क्यों की? इसका पीछे का कारण 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में दर्ज सामाजिक-जातिगत रुझान हैं, जिनका इस्तेमाल कांग्रेस अपना खोया हुआ वोट बैंक वापस पाने के लिए कर रही है।
सीएसडीएस-लोकनीति (Center for the Study of Developing Societies) के सर्वेक्षण से साफ होता है कि 2022 के चुनाव में मुस्लिम विवि और नमाज की छुट्टी जैसे मुद्दों ने सवर्ण बहुल उत्तराखंड को ध्रुवीकृत कर दिया। इसका नतीजा यह देखने को मिला कि अधिकांश दलित और मुस्लिम वोट कांग्रेस की ओर झुके, जबकि ब्राह्मण और क्षत्रिय (ठाकुर) वर्ग के वोटों में भाजपा की ओर बढ़ोतरी हुई। यही वजह रही कि भाजपा ने ‘मिथक’ को तोड़कर दोबारा सत्ता हासिल की, जबकि कांग्रेस की सीटें 2017 के मुकाबले बढ़कर 19 हो गईं।
उत्तराखंड में 12 प्रतिशत ब्राह्मण, 33 प्रतिशत ठाकुर, 19 प्रतिशत दलित और 14 प्रतिशत मुस्लिम आबादी की जातिगत संरचना है। ऐतिहासिक तौर पर ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम कांग्रेस के समर्थक माने जाते थे, लेकिन स्प और बसपा के उदय के बाद दलित और मुस्लिम वोटर्स की दिशा बदली। हालांकि, पिछले दशक में बसपा की कमजोरी के कारण दलित वोटर्स फिर से कांग्रेस की ओर लौटने लगे हैं।
आंकड़ों का विश्लेषण करने पर 2022 के चुनाव का असली नक्शेखान सामने आता है। भाजपा के हिसाब से, 2017 में 52 प्रतिशत ब्राह्मण वोट 2022 में 63 प्रतिशत तक पहुंच गया। ठाकुर वोट 53 से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया। इसके विपरीत, अन्य सवर्णों का समर्थन 68 से घटकर 56 प्रतिशत रह गया। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता दलित वोट है, जो 2017 के 37 प्रतिशत से घटकर 2022 में 26 प्रतिशत रह गया। मुस्लिम वोट भी 10 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत पर आकर ठहरा।
कांग्रेस के मामले में स्थिति थोड़ी अलग है। उसका सवर्ण आधार कमजोर हुआ है। ब्राह्मण वोट 28 से घटकर 26 प्रतिशत और ठाकुर वोट 29 से घटकर 26 प्रतिशत रह गया। लेकिन इसके बदले में, दलित वोटों में कांग्रेस को जबरदस्त बढ़त मिली। 2017 में 23 प्रतिशत दलितों ने कांग्रेस को वोट दिया था, जो 2022 में 48 प्रतिशत तक पहुंच गया—यानी समर्थन दोगुने से भी ज्यादा हो गया। मुस्लिम वोट में मामूली गिरावट आई (78 से 77 प्रतिशत), लेकिन अन्य जातियों में कांग्रेस का आधार 42 से बढ़कर 46 प्रतिशत हो गया।
क्षेत्रवार विश्लेषण भी इसी रणनीति की ओर इशारा करता है। भाजपा को गढ़वाल, कुमाऊं और मैदानी क्षेत्रों में ब्राह्मण और ठाकुरों का भरपूर समर्थन मिला। दलित वोटों के मामले में, गढ़वाल में 49 प्रतिशत और कुमाऊं में 64 प्रतिशत दलित वोट कांग्रेस के खाते चले, जबकि मैदानी क्षेत्र में 37 प्रतिशत दलित वोट बसपा की ओर गए। 2022 में बसपा का दलित आधार 27 से घटकर 16 प्रतिशत रह गया, जबकि उसका मुस्लिम आधार 3 से बढ़कर 5 प्रतिशत हो गया।
निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस ‘शुद्धिकरण’ जैसे मुद्दों को उछालकर दलित वर्ग के उस बड़े हिस्से को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है, जो 2022 में उसकी ओर झुका था, ताकि आगामी चुनावों में यह आधार मजबूत किया जा सके।
