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उत्तराखंड के बुजुर्गों के लिए सीएम धामी का ऐतिहासिक संकल्प: 147 करोड़ की पेंशन का ट्रांसफर, दिव्यांगों के लिए कोचिंग और ‘वृद्धाश्रम मुक्त’ समाज की सख्त मांग

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के पवित्र अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड में वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, सुरक्षा और कल्याण के लिए एक नई दिशा तय की है। देहरादून के नींबूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह के दौरान मुख्यमंत्री ने न केवल 9,93,886 पेंशनर्स के खातों में एक सिंगल क्लिक के माध्यम से कुल 147 करोड़ 34 लाख 53 हजार रुपये की धनराशि सीधे हस्तांतरित की, बल्कि दिव्यांगों के सशक्तिकरण के लिए ‘दिव्यांगजन सिविल सर्विस कोचिंग’ का भी शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर अपना स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि वे केवल प्रदेश के मुख्य सेवक नहीं, बल्कि उत्तराखंड के बेटे हैं, और राज्य के प्रत्येक बुजुर्ग के सम्मान और आढ़ा की पूरी जिम्मेदारी उन पर लागू है। उन्होंने बुजुर्गों को परिवार का ‘सुरक्षा कवच’ और घर में शांति एवं ईश्वर के वास का प्रतीक बताया, जो समाज की रीढ़ की हड्डी हैं।

समारोह के दौरान मुख्यमंत्री ने वह संवेदनशील और गहन विचार रखते हुए भारतीय संस्कृति की मूल पहचान को रेखांकित किया कि आदर्श भारतीय समाज में ‘वृद्धाश्रमों’ की खंडन ही होनी चाहिए। उन्होंने भावुक होकर कहा कि बुजुर्गों का असली घर वृद्धाश्रम नहीं, बल्कि अपने परिवार के बीच मान-सम्मान के साथ रहना है। सीएम धामी ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि स्वर्गीय पिता की सीख और माताजी के आशीर्वाद ने ही उन्हें राज्य सेवा के लिए प्रेरित किया है। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों को अच्छे संस्कार और जीवन के सही आदर्श केवल बुजुर्गों के सानिध्य में मिलते हैं, इसलिए उनके सम्मान का प्रश्न सामाजिक नैतिकता का सवाल है। इस दौरान उन्होंने 23 ऐसे वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानित किया, जिन्होंने समाज और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है, साथ ही वृद्धजन दिवस पर आयोजित निबंध और पेंटिंग प्रतियोगिता में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले 5 मेधावी छात्र-छात्राओं को भी पुरस्कृत किया गया।

सरकार द्वारा वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए उठाए गए संरचनात्मक कदमों की व्याख्या करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य में हर बुजुर्ग को 1,500 रुपये की मासिक पेंशन दी जाती है। इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही परिवार में पति और पत्नी दोनों को अलग-अलग पेंशन का लाभ प्राप्त होता है। बुनियादी ढांचे की बात करें तो यदि बागेश्वर, चमोली और उत्तरकाशी में मौजूदा वृद्धाश्रम कार्यरत हैं, तो देहरादून, अल्मोड़ा और चंपावत में नई और आधुनिक सुविधाओं के साथ केंद्रों का निर्माण कार्य जोरों पर चल रहा है। हालांकि, मुख्यमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि इन संस्थानों का उद्देश्य बुजुर्गों के लिए ‘शरण’ बनना नहीं, बल्कि अनिवार्यता की स्थिति में सहयोग प्रदान करना है, जबकि लक्ष्य परिवार के भीतर ही सम्मानपूर्ण जीवन सुनिश्चित करना है।

इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम’ की सख्ती से लागू करने का भी ऐलान किया, जिससे बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होगी। इसके अलावा, ‘दीनदयाल मातृ-पितृ तीर्थाटन योजना’ के तहत बुजुर्गों के लिए मुफ्त तीर्थयात्राओं का आयोजन जारी रहेगा, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘आयुष्मान भारत योजना’ के जरिए मुफ्त इलाज की सुविधा को और बेहतर बनाया जाएगा। कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण, सम्मान और सेवा की सामूहिक शपथ ली। पर्यावरण संरक्षण के संदेश को उभारते हुए, ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत परिसर में पौधारोपण का भी आयोजन किया गया, जो बुजुर्गों के प्रति प्रेम और प्रकृति के प्रति जवाबदेही का प्रतीक रहा।

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।