कुमाऊँ मंडल के मुख्य कार्यालय, हल्द्वानी में मंडलायुक्त दीपक रावत ने आज जिले के सभी जिलाधिकारियों को एकत्रित करके सरकारी प्रमाण‑पत्रों, विशेषकर जमीन के अभिलेख (लैंड म्यूटेशन) और विभिन्न प्रमाण‑पत्रों की प्रक्रिया में तत्काल बदलाव की घोषणा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब उन मामलों में जहाँ स्थल पर जाकर जाँच आवश्यक है, संबंधित लेखपाल या पटवारी द्वारा स्थलीय सत्यापन अनिवार्य किया जाएगा। इस दिशा‑निर्देश का उद्देश्य प्रमाण‑पत्रों की वैधता को सुदृढ़ करना और नकली दस्तावेज़ों के प्रसार को रोकना है।
निर्देशों के अनुसार, यदि किसी आवेदन में जमीन के स्वामित्व, सीमाओं या परिवर्तन से जुड़ी कोई शंका उत्पन्न होती है, तो लेखपाल या पटवारी को सीधे साइट पर जाकर भू‑सर्वेक्षण, सीमांकन और मौजूदा रिकॉर्ड की तुलना करनी होगी। इस प्रक्रिया में डिजिटल मैपिंग, फोटो‑डॉक्यूमेंटेशन और स्थानीय लोगों से साक्षात्कार को भी अनिवार्य किया गया है। केवल दस्तावेज़ी जांच पर निर्भर रहने की पुरानी प्रथा को समाप्त कर, अब प्रत्यक्ष जाँच को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता और भरोसेमंदता बढ़ेगी।
जिला स्तर पर यह नया प्रोटोकॉल लागू करने के लिए जिलाधिकारियों को दो हफ़्ते के भीतर सभी संबंधित विभागों को प्रशिक्षित करने और आवश्यक तकनीकी साधनों की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया। रावत ने कहा कि इस पहल से न केवल आवेदन की स्वीकृति में देरी कम होगी, बल्कि आम जनता को भी अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक किया जाएगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि कोई अधिकारी इस निर्देश का उल्लंघन करता है, तो कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
कुशल प्रशासनिक उपायों के माध्यम से कुमाऊँ मंडल में भूमि अभिलेख और प्रमाण‑पत्रों की प्रक्रिया को आधुनिक बनाना, प्रदेश के समग्र विकास में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस नई नीति के लागू होने से न केवल भूमि विवादों में कमी आएगी, बल्कि निवेशकों और नागरिकों दोनों को एक भरोसेमंद, तेज़ और पारदर्शी सेवा प्रदान करने की दिशा में राज्य की प्रतिबद्धता स्पष्ट होगी।
