हाल ही में चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम से जुड़ी एक अजीब घटना ने देश भर में चर्चा पैदा कर दी है। भाकपा माले के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी को एक अनपेक्षित एसएमएस मिला, जिसमें लिखा था कि “आपके द्वारा दायर की गई मतदाता सूची सुधार के आवेदन को स्वीकृति मिल गई है।” मैखुरी साहब ने तो स्वयं ही आश्चर्यचकित हो कर सोचा कि उन्होंने कोई आवेदन ही क्यों दिया? क्या चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर खुद ही उनकी ओर से फॉर्म सबमिट कर रहा है?
यह घटना उत्तराखंड में “स्पेशल समरी रिवीजन (SSR)” के आरम्भ से पहले ही सामने आई। सिस्टम के भीतर ऑटोजेनरेटेड फॉर्म‑7 से लेकर अब फॉर्म‑8 तक के दस्तावेज़ बिना किसी आवेदन के ही तैयार हो रहे हैं। इससे वोटर अपने नाम, पता या पिता के नाम में बदलाव चाहें या न चाहें, सिस्टम उनके डेटा को बिना पूछे ही बदल देता है। ऐसे बदलावों के कारण चुनाव के दिन कई नागरिक अपनी ही पर्ची खोजते हुए खोखले हाथों से मतदान बूथ छोड़ देते हैं।
उसी तरह, उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह के विचित्र बदलाव देखे गए। “रामहित यादव” का नाम “राम ने यादव को मारा” में बदल गया, पिता का नाम “B.Com” के रूप में प्रकट हुआ, और “मोहम्मद इकबाल” को “मोहम्मद इकबाल भीख मांगते हैं” लिखा गया। इन गड़बड़ियों का कारण सॉफ्टवेयर की “डिक्शनरी” और “लिटरल ट्रांसलेशन” के त्रुटिपूर्ण कार्यान्वयन को माना जा रहा है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय ने इन घटनाओं की जाँच के लिए निर्देश जारी किया है और जिम्मेदार कर्मचारियों पर कार्रवाई के आदेश दिए हैं। चुनाव आयोग ने कहा कि यह पहली बार लागू हुए ऑनलाइन सॉफ्टवेयर में हुई तकनीकी त्रुटि के कारण हुआ है।
इस तरह के अनियंत्रित ऑटो‑जेनरेशन से लोकतंत्र पर गहरा असर पड़ सकता है। यदि बिना किसी नागरिक की सहमति के उसकी वोटर जानकारी बदल दी जाती है, तो वह चुनाव के दिन मतदान के अधिकार से वंचित रह सकता है। इसलिए, यदि किसी को भी चुनाव आयोग से ऐसा कोई संदेश मिलता है, तो तुरंत अपने ब्लॉक या तहसील कार्यालय से संपर्क करना आवश्यक है। यह सुनिश्चित करेगा कि आपकी वोटर पर्ची सही रहे और आप बिना किसी बाधा के अपना मत दे सकें।
