किच्छा में चुनावी तनाव का भयंकर रूप: स्ट्रांग रूम के बाहर विधायक बेहड़ और शुक्ला का आमना-सामना, थप्पड़बाजी के बाद दोनों नेता हिरासत में

ऊधमसिंह नगर के किच्छा में नगर पालिका चुनाव की मतगणना से जुड़े मंगलवार के तनावपूर्ण वातावरण ने एक बार फिर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की गहराई को उजागर कर दिया। स्ट्रांग रूम के बाहर शुरू हुआ यह सनसनीखेज हंगामा तब और भडका, जब विधायक तिलक राज बेहड़ और भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला आमने-सामने आ गए। इस घटनाक्रम ने निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच स्थिति को और भी जटिल बना दिया, जिसके परिणामस्वरूप दोनों ही बड़े नेताओं को पुलिस द्वारा हिरासत में लिया गया।

विवाद की जड़ स्ट्रांग रूम के आगे लगाए गए पर्दे और तिरपाल तक जाती है, जिसका विधायक बेहड़ ने तीव्र विरोध किया। उनका तर्क था कि इस प्रकार की व्यवस्था से चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो जाते हैं और यह गलत संदेश देती है। इसी दौरान राजेश शुक्ला अपने समर्थकों के साथ स्थल पर पहुँचे, जहाँ दोनों पक्षों के बीच जोरदार बहस शुरू हो गई। बात बात को शरारती मोड़ लेते हुए धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई, जिसमें विधायक बेहड़ ने आरोप लगाया कि उन्हें थप्पड़ मारा गया। उन्होंने पुलिस को तहरीर देने की चेतावनी देते हुए अपनी पीड़ितता जताई, जबकि दूसरी तरफ राजेश शुक्ला के एक समर्थक को ही थप्पड़ मारने का आरोप लगाया गया।

स्थिति को संभालने के प्रयासों के बावजूद तनाव और भी बढ़ गया। विधायक बेहड़ ने अपने समर्थकों के साथ धरना देना शुरू किया, जिसके दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और वे बेहोश हो गए। समर्थकों ने उन्हें संभाला, लेकिन पुलिस ने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजेश शुक्ला को पहले सिडकुल चौकी और बाद में बेहड़ को किच्छा कोतवाली में हिरासत में लिया। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर हाथापाई और विवाद खींचने के आरोप लगाए, जबकि राजेश शुक्ला का दावा था कि वे बस स्थिति की जानकारी लेने गए थे।

हाल ही में, किच्छा नगर पालिका चुनाव की मतगणना को लेकर हाईकोर्ट में लंबित मुकदमा स्थिति को और गंभीर बना रहा है, जिसके कारण फिलहाल मतगणना पर रोक लगाई गई है। प्रशासन ने पुलिस बल के माध्यम से स्ट्रांग रूम की सुरक्षा को और कड़ा कर दिया है ताकि किसी भी प्रकार के भविष्य के हंगामे को रोका जा सके। इस घटना ने केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी चुनावी न्यायिक प्रक्रिया के चारों ओर घिर रहे संकटों पर प्रकाश डाला है, जहाँ पारदर्शिता के दावों और वास्तविक व्यवस्था के बीच का खायागाह गहराता जा रहा है।