उत्तराखंड के गढ़वाल‑कुमाऊँ और जौनसार की ध्वनि‑इतिहास को नई जान देने के लिये दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने एक अनूठा प्रोजेक्ट पूरा किया है। इस पहल में 1939 से 1979 के बीच रिकॉर्ड किए गए 46 ग्रामोफोन गीतों को खोजकर डिजिटल किया गया, जिनमें 18 विभिन्न कलाकारों के रचनाएँ शामिल हैं। परियोजना के अध्यक्ष प्रो. बी. के. जोशी और निदेशक एन. रवि शंकर के मार्गदर्शन में काम करने वाली टीम ने इस कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न किया, जिससे लगभग लुप्त हो चुके लोक संगीत को भविष्य की पीढ़ियों के लिये संरक्षित किया गया।
डिजिटल संग्रह में मशहूर गढ़वाली गायक जीत सिंह नेगी का 1949 का हिट “तू होली बीरा” तथा 1970 के दशक का मोहन उप्रेती का लोकप्रिय “बेड़ू पाको” भी शामिल हैं। ये दो गीत उत्तराखंड में ग्रामोफोन रिकॉर्ड के चार दशकों के विकास को दर्शाते हैं। सबसे अधिक गाने जीत सिंह नेगी और गोपी देवी के मिलते‑जुलते छह‑छह रिकॉर्ड में पाए गए, जबकि मोहिनी शर्मा, उमा शंकर सतीश, गोपाल बाबू गोस्वामी, राज किशोर मिश्रा, वाचस्पति ड्युंडी, चंदा बाई और चंपा देवी के चार‑चार गीत संग्रह में शामिल हैं। शेर सिंह, इंदिरा बाई, राम प्यारी, केशव अनुरागी, नयम खान, विजय छेत्री, सुषमा चंदोला और बिजेंद्र लाल शाह जैसे कलाकारों के गीत भी इस डिजिटल कोष में सम्मिलित किए गए हैं।
प्रोजेक्ट के दौरान कुल 21 बड़े ग्रामोफोन लेबलों – “हिज़ मास्टर्स वॉयस”, “कोलंबिया”, “एरो‑फ़ोन”, “इंडियन रिकॉर्ड्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (INRECO)” और “स्टार हिंदुस्तान रिकॉर्ड कंपनी” – के रिकॉर्ड मिलें। इनमें से सात रिकॉर्ड भारत की आज़ादी से पहले के हैं, जबकि शेष 14 स्वतंत्रता के बाद के समय के हैं। रिकॉर्ड खोजने की प्रक्रिया कठिन थी; टेप‑रेकोर्डर और सीडी के उदय से ग्रामोफोन धीरे‑धीरे अनदेखे हो गए। फिर भी फरीदाबाद के गोकुल नेगी, देहरादून के रिटायर्ड ब्रिगेडियर राजेंद्र रावत, तथा नई दिल्ली के ज़फ़र शाह जैसे संग्रहकर्ताओं के सहयोग से कई दुर्लभ रिकॉर्ड प्राप्त हुए। फरीदाबाद से सात और दिल्ली से चार रिकॉर्ड डिजिटल किए गए, जिनमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निर्मित दो नॉन‑कमर्शियल रिकॉर्ड भी शामिल हैं।
डिजिटलाइज़ेशन के बाद दून पुस्तकालय अब गढ़वाल‑कुमाऊँ‑जौनसार के ग्रामोफोन इतिहास पर विस्तृत शोध रिपोर्ट तैयार कर रहा है। चंद्रशेखर तिवारी के अनुसार, इस रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य इन ध्वनि‑धरोहरों को सांस्कृतिक महत्व के आधार पर संरक्षित करना और भविष्य के शोधकर्ताओं के लिये सुलभ बनाना है। राजू गुसाईं, जो इस कार्य में लगभग एक दशक से लगे थे, ने कहा कि “‘बेड़ू पाको’ के दो अलग‑अलग वर्शन अब डिजिटल रूप में उपलब्ध हैं, प्रत्येक का अपना अनोखा अंदाज़ है।” इस प्रकार, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने उत्तराखंड की लोक विरासत को डिजिटल युग में सुरक्षित कर, संगीत प्रेमियों और इतिहासकारों दोनों के लिये एक अमूल्य संसाधन तैयार किया है।
Original Title: उत्तराखंड की लोक विरासत का डिजिटल संरक्षण, 18 कलाकारों के 46 पुराने गाने सुरक्षित
Original Content: दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने लोक संगीत के 46 ऐसे ग्रामोफोन गानों को खोजकर डिजिटल किया है जो लगभग लुप्त हो चुके थे। इन गानों को खोजने और डिजिटल करने के लिए एक खास प्रोजेक्ट चलाया गया था। इसमें 18 कलाकारों के कुल 46 गानों को डिजिटल किया गया।
