ज्योतिष गणना अनुसार इस वर्ष भगवान श्री कृष्ण का 5250वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा जानते हैं क्या है

ज्योतिष गणना अनुसार इस वर्ष भगवान श्री कृष्ण का 5250वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा जानते हैं क्या है
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ज्योतिष गणना के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का अवतरण इस धरती पर आज से 3226 वर्ष ईसा पूर्व द्वापरयुग के अन्त में हुआ था। अर्थात वर्तमान में ईसवी
के 2024 वर्ष चल रहे हैं अतः 3226 और 2024 को जोडने पर 5250 वर्ष होते हैं अतः इस वर्ष
भगवान श्री कृष्ण का 5250वां जन्मदिन होगा।
शुभ मुहूर्त
इस बार सन् 2024 में दिनांक 26 अगस्त 2024 दिन सोमवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व मनाया जाएगा। इस दिन यदि अष्टमी तिथि की बात करें तो 51 घड़ी 17 पल अर्थात अगले दिन प्रातः 2:20 तक अष्टमी तिथि रहेगी। यदि नक्षत्र की बात करें तो कृतिका नक्षत्र 25 घड़ी 15 पल अर्थात शाम 3:55 बजे तक है तदुपरांत रोहिणी नक्षत्र उदय होगा। व्याघ्र नामक योग 41 घड़ी आठ पल अर्थात रात्रि 10:17 बजे तक है। बालव नामक करण 22 घड़ी 46 पल अर्थात दोपहर 2:56 बजे तक है। सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन के चंद्रमा की स्थिति को जानें तो इस दिन चंद्र देव वृषभ राशि में विराजमान रहेंगे।
जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त
यदि जन्माष्टमी पूजा के मुहूर्त के बारे में जाने तो इस दिन मध्य रात्रि 12:01 बजे से 12:45 तक 44 मिनट का समय पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
भगवान श्री कृष्ण की लीलाएं अनंत है कितु प्रमुख रूप से उनकी तीन
लीलाएं विशेष प्रसिद्ध है। इन तीन लीलाओं में उनका आरंभ होता है।
ब्रज लीला से तदनंतर आती है।माथुर लीला और अंत में द्वारिका
लीला। एक ही व्यक्ति ने इन तीन लीलाओं का प्रदर्शन अपने जीवन
के विभिन्न भागों में किया था। अतः श्री कृष्ण की एकता में किसी प्रकार
का संदेह नहीं किया जा सकता।जो व्यक्ति श्री कृष्ण के व्यक्तित्व में
भेद मानता है उसका चिंतन सर्वथा निराधार है। श्री कृष्ण का गोपियों
के साथ लीला विलास का संबंध जीवन के प्रारंभ से लेकर अंत तक रहता है। उन्होने उस समय अपने
जेष्ठ भ्राता को गोकुल में नंद के घर में रोहिणी माता के गर्भ में योग
माया के आशय से संयुक्त करा दिया था। जो संकर्षण नाम से विख्यात हुए। शिशु के प्रभाव से
देवकी तथा वसुदेव को कारागार में रखने पर भी उनके जीवन में अद्भूत
लीला दृष्टिगोचर हुई थी। रक्षक लोगों को निद्रा आ गई थी तथा उनके बंधन मुक्त हो गए थे। कृष्ण
जब अपने जीवन के प्रारंभ में गोकुल आए तब यशोदा को कन्या की प्राप्ति हुई थी यह भी कृष्ण के जीवन के आरंभिक काल का लीला
विलास था । श्री कृष्ण के आरंभिक जीवन में गोपियों के साथ नाना
प्रकार की लीलाओं का विन्यास दृष्टिगोचर होता है। कंस द्वारा कृष्ण
को मारने के अनेक उपायों में उनकी लीला का विलास दृष्टिंगोचर
होता है। कृष्ण की जीवन लीला को समाप्त करने के लिए कंस ने विविध चेष्टा की थी और इनमे कृष्ण के जीवन का विलास प्रचुर मात्रा में
देखा जा सकता है। उन्हें मारने के लिए पूतना भेजी गई थी और बालक कृष्ण ने उसे दूध पीते ही
मार डाला। यह भी उनके आरंभिक जीवन का विलास ही था।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा
स्कंद पुराण के अनुसार द्वापर युग की बात है उन दिनों मथुरा में उग्रसेन नाम के एक राजा हुए।
स्वभाव से वह सीधे साधे थे। यही वजह थी कि उनके पुत्र कंस ने ही
उनका राज्य हड़प लिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा । कंस की एक बहन थी जिसका नाम था
देवकी। कंस उससे बहुत स्नेह करता था। देवकी का विवाह वसुदेव से तय हुआ तो विवाह संपन्न
होने के बाद कंस उसे स्वयं ही रथ हांकते हुए बहन को ससुराल छोड़ने
के लिए रवाना हुआ। स्कंद पुराण के अनुसार जब वह बहन को छोड़ने के लिए जा रहा था तभी एक आकाशवाणी हुई की जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा करने स्वयं ही जा रहा है इसी बहन का आठवां पुत्र तेरा संहार करेगा। यह सुनते ही कंस क्रोधित हो गया और देवकी और वसुदेव को मारने के लिए जैसे
ही आगे बढ़ा तभी वसुदेव ने कहा कि वह देवकी को कोई नुकसान न पहुचाएँ। वह स्वयं ही देवकी की
आठवीं संतान कंस को सौंप देगा।
इसके बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को मारने के बजाय कारागार में डाल दिया।कारागार में देवकी ने सात संतानों को जन्म दिया और कंस ने सभी
को एक-एक करके मार दिया। इसके बाद जैसे ही देवकी फिर से गर्भवती हुई तभी कंस ने कारागार
का पहरा और भी कड़ा कर दिया।तब भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की
अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में श्री कृष्ण का जन्म हुआ। तभी श्री विष्णु ने वसुदेव को दर्शन देकर
कहा कि वह स्वयं ही उनके पुत्र के रूप में जन्मे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वसुदेव जी उन्हें वृंदावन अपने मित्र नंद बाबा के घर पर छोड़ आएं और यशोदा जी के गर्भ से जिस कन्या का जन्म हुआ है उसे कारागार में ले आए। यशोदा जी के गर्भ से जन्मी कन्या कोई और नहीं बल्कि स्वयं माया थी। यह सब कुछ सुनने के बाद वसुदेव जी ने वैसा ही किया। भगवान श्री कृष्ण के जन्म लेते हीं
वसुदेव जी ने जैसे ही श्री कृष्ण को अपनी गोद में उठाया कारागार के ताले खुद ही खुल गए ।पहरेदार अपने आप ही नींद के आगोश में आ गए। फिर वसुदेव जी कन्हैया को टोकरी में रखकर वृंदावन की ओर चले। कहते हैं कि जिस समय यमुना जी पूरे ऊफान पर थी तब
वसुदेव जी महाराज ने टोकरी को सिर पर रखा और यमुना जी को
पार करके नंद बाबा के घर पहंचे।वहां कन्हैया को यशोदा जी के पास
रखकर कन्या को लेकर मथुरा वापस लौट आए।
स्कंद पुराण के अनुसार जब कंस को देवकी के आठवीं संतान के बारे
में पता चला तो वह कारागार पहुंचा। वहां उसने देखा की आठवीं
संतान तो कन्या है फिर भी वह उसे जमीन पर पटकने ही वाला था कि
वह माया रुपी कन्या हाथ से छूट कर आसमान में पहुंचकर बोली की रे मूर्ख! मुझे मारने की कोशिश मत कर मुझे
मारने से कुछ नहीं होगा। तेरा काल तो पहले ही वृंदावन पहुंच चुका है।
और बहुत जल्दी ही तेरा अंत करेगा। इसके बाद कंस ने वृंदावन में जन्मे नवजातों का पता लगाया।जब यशोदा के लाला का पता चला
तो उसे मारने के लिए कई प्रयास किए। कई राक्षसों को भेजा लेकिन कोई भी उस बालक का बाल भी
बांका नहीं कर पाया तो कंस को यह एहसास हो गया की नंद बाबा का बालक ही वसुदेव देवकी की आठवीं संतान है। भगवान श्री कृष्ण ने युवावस्था में कंस का अंत किया इस प्रकार जो भी यह कथा पढ़ता है तो उसके सभी पापों का नाश हो जाता है।
तो बोलिए नंद नंदन भगवान श्री कृष्ण की जय।
आप सभी को सपरिवार श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
लेखक आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल।

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