देहरादून के पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक खुशखबरी आई है। जर्नल ऑफ थ्रेटन्ड टैक्सा (JoTT) के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने दिखाया है कि जब पशु शवों के डंप को हाई‑टेंशन बिजली लाइन से 2.4 किमी दूर स्थानांतरित किया गया, तो गिद्धों के बिजली के करंट से मरण की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई।
अध्ययन में जावेद अनवर, यश वर्धन सिंह सेंगर, बिकाश घिमिरे, वोनचानो नगुली, हेमम रामा नंदा, ताशी पी. दोरजी, अंकित शर्मा, अक्षय जैन, सास बिस्वास, अरुण कुमार और एम. मुजाहिद जैसे वैज्ञानिकों ने भाग लिया। मई 2011 से फरवरी 2014 के बीच सुद्धोवाला क्षेत्र में 34 सर्वेक्षण किये गये, जिनमें 743 गिद्धों का रिकार्ड रखा गया। इस अवधि में हाई‑टेंशन बिजली ट्रांसमिशन ढांचों के पास करंट से 46 गिद्धों के शव मिले, जिनमें हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन और सिनेरियस वल्चर सबसे अधिक प्रभावित हुए।
अध्ययन के बाद स्थानीय अधिकारियों ने अप्रैल 2015 में शव डंपिंग साइट को बिजली ढांचे से लगभग 2.4 किमी दूर स्थानांतरित किया। नई साइट पर गिद्ध आने लगे, परंतु सीमित निगरानी में कोई मृत्यु नहीं पाई गई। वहीं, काली चील और क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल जैसी अन्य शिकारी पक्षी भी वहाँ देखे गये। जावेद अनवर ने बताया कि यह कदम गिद्धों के करंट लगने के जोखिम को कम करने के लिए एक व्यावहारिक संरक्षण उपाय साबित हुआ और इसे अन्य प्रभावित क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है, हालांकि 2015 के बाद कोई नया अध्ययन नहीं हुआ।
गिद्धों की संकटग्रस्त स्थिति पर प्रकाश डालते हुए, यह स्पष्ट है कि भारत और विश्व में गिद्ध आबादी एशिया और अफ्रीका में मानवीय कारणों से गिर रही है। डिक्लोफिनाक जैसी दवाओं के सेवन से उनके गुर्दे फेल होते हैं, जिससे मृत्यु होती है। 2006 में सरकार ने मवेशियों के लिए डिक्लोफिनाक की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया। भोजन की कमी, आवास का नुकसान और बिजली के ढांचे से होने वाले करंट, गिद्धों के अस्तित्व के प्रमुख खतरे हैं।
उत्तराखंड में भारत के 9 में से 8 गिद्ध प्रजातियाँ पाई जाती हैं। 2007 में वन्यजीव विभाग की गणना के अनुसार क्षेत्र में 5,066 गिद्ध थे, जिनमें 1,272 संरक्षित क्षेत्रों में और 3,794 बाहरी क्षेत्रों में थे। 2008 की जुलाई में यह संख्या घटकर 4,720 रह गई, यानी पूरे वर्ष में 346 गिद्धों की कमी हुई।
पिथौरागढ़ वन प्रभाग में सबसे अधिक गिद्ध पाए गये – 573, जबकि अन्य प्रभागों में निम्नलिखित संख्या पाई गयी:
– उत्तरकाशी: 473
– गढ़वाल: 365
– टिहरी: 330
– राजाजी राष्ट्रीय पार्क: 282
– तराई केंद्रीय: 261
– बद्रीनाथ: 245
– हरिद्वार: 245
– केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग: 242
– नैनीताल: 201
– लैंसडाउन: 196
– अपर यमुना: 163
– गोविंद वन्यजीव विहार: 149
– बागेश्वर: 146
– सिविल सोयम: 133
– देहरादून: 131
– मसूरी: 129
– टौंस: 99
– चकराता: 96
– नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क: 85
– तराई पश्चिम: 74
– तराई पूर्वी: 65
– रुद्रप्रयाग: 21
– हल्द्वानी: 10
– रामनगर: 6
इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि शव डंपिंग साइट को बिजली ढांचे से दूर ले जाने से गिद्धों की मृत्यु दर में कमी आ सकती है, और यह प्रबंधन कदम अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।
