📅 Saturday, 24 October 2026 ⛅ 24°C नैनीताल / देहरादून 📈 SENSEX +420.5 (82,140)
Ad Space (728x90) - Appearance > Customize > Ad Placements
⚡ ब्रेकिंग न्यूज़
होम » खबरनामा » उत्तराखंड में कचरा प्रबंधन का क्रांतिकारी बदलाव: 2026 से लागू होंगे सख्त नियम, प्लास्टिक उत्पादकों पर होगा ‘वापसी’ का दबाव

उत्तराखंड में कचरा प्रबंधन का क्रांतिकारी बदलाव: 2026 से लागू होंगे सख्त नियम, प्लास्टिक उत्पादकों पर होगा ‘वापसी’ का दबाव

उत्तराखंड सरकार ने राज्य को ‘हरा-भरा’ और ‘साफ-सुथरा’ रखने के अपने संकल्प को ठोसता देने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अगुवाई में, राज्य अब केवल बड़े शहरों तक सीमित कचरा प्रबंधन को तोड़कर इसे छोटे कस्बों, अर्धशहरी इलाकों और पहाड़ों के प्रमुख पर्यटन स्थलों तक विस्तारित करने जा रहा है। इस नए मॉडल का उद्देश्य न केवल शहरों को गंदगी से मुक्त करना है, बल्कि पर्यटन उद्योग की छवि को भी बनाए रखना है, ताकि उत्तराखंड की प्राकृतिक खूबसूरती नष्ट न हो। यह पहल ‘स्वच्छ उत्तराखंड मिशन 2026-2030’ की रूपरेखा का हिस्सा है, जो राज्य के भविष्य के पर्यावरणीय नियमों का आधार बनेगी।

शुक्रवार को देहरादून में हुई ‘ठोस अपशिष्ट प्रबंधन राज्य स्तरीय कार्यान्वयन एवं निगरानी समिति’ की अहम बैठक ने इस बदलाव की दिशा तय की। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में ‘ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026’ और ‘प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026’ को पूर्ण रूप से लागू करने की रणनीति पर गहरी चर्चा हुई। मुख्य सचिव ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि ये नियम केवल सरकारी दफ्तरों और कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनके प्रभाव का असर जमीनी स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखे। उन्होंने तुरंत एक व्यावहारिक बायलॉज (नियमावली) तैयार करने का आदेश दिया, जिसे राज्य कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा, ताकि पूरे प्रदेश में इन नियमों के सख्त कानूनी प्रवर्तन का मार्ग प्रशस्त हो सके।

नए नियमों में सबसे बड़ा बदलाव ‘बल्क वेस्ट जनरेटर’ यानी भारी मात्रा में कचरा पैदा करने वाले संस्थानों की जिम्मेदारी को परिभाषित करने में देखा जाता है। होटल, मैरिज हॉल, प्राइवेट संस्थान और फैक्ट्रियां जो भारी मात्रा में अपशिष्ट पैदा करती हैं, उन्हें अब अपने कचरे के प्रबंधन के लिए पूरी तरह से उत्तरदायी माना जाएगा। साथ ही, प्लास्टिक उत्पादक कंपनियों पर ‘एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (EPR) के नियमों को कड़ा किया गया है। इसका अर्थ है कि जो कंपनियां प्लास्टिक पैकिंग या सामान बनाती हैं, उन्हें अब अपने उत्पादों से उत्पन्न हुए कचरे को कलेक्ट करने, रीसाइक्लिंग करने और वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करने में अपनी भूमिका निभानी होगी। यह कदम प्लास्टिक प्रदूषण को स्रोत पर ही नियंत्रित करने का प्रभावी उपाय है।

कार्रवाई और निगरानी के तौर-तरीकों में भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। लापरवाही बरतने वालों और गंदगी फैलाने वालों पर चालान और दंड के प्रावधान पहले से कहीं ज्यादा सख्त किए गए हैं। डिजिटल ट्रैकिंग को अपनाते हुए, अब कचरा प्रबंधन से जुड़ी हर कार्रवाई का ब्योरा सरकारी पोर्टल पर ऑनलाइन अपलोड करना अनिवार्य होगा। इसका मुख्य लक्ष्य लैंडफिल या डंपिंग यार्ड तक पहुंचने वाले कचरे की मात्रा को न्यूनतम करना है। इसके लिए गीले और सूखे कचरे के सख्त विभाजन (segregation) और पुनर्चक्रण (recycling) पर विशेष जोर दिया जाएगा।

समिति के सचिव नितेश झा और रणवीर सिंह चौहान समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि नगर निकायों और ग्राम पंचायतों के कर्मचारियों को नए नियमों के अनुरूप विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी, ताकि ग्रामीण और पर्यटन क्षेत्रों में भी सफाई व्यवस्था प्रभावी हो। साथ ही, स्कूलों, कॉलेजों और कौशल विकास केंद्रों के जरिए युवाओं और बच्चों में सफाई और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने का एक व्यापक अभियान भी चलाया जाएगा। यह सामूहिक प्रयास उत्तराखंड को न केवल स्वच्छ बनाने, बल्कि उसे एक मॉडल राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा।

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।