उत्तराखंड के ग्रामीण विकास और पंचायती राज व्यवस्था की दिशा-निर्देशों को लेकर एक तीव्र राजनीतिक संघर्ष का आगाज़ हो गया है। जिला पंचायत सदस्यों की ओर से सरकार के खिलाफ एकजुट मोर्चा खोलते हुए, उत्तराखंड जिला पंचायत सदस्य संगठन ने 12 अक्टूबर को प्रदेश के सभी 13 जिलों में एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। यह आंदोलन मुख्यतः पंचायती राज संरचना में जिला पंचायत सदस्यों के अधिकारों की उपेक्षा, वित्तीय प्रावधानों में कथित असमानता और विकास कार्यों में उत्पन्न होने वाली बाधाओं के विरोध में किया जा रहा है। संगठन का दृढ़ मानना है कि वर्तमान व्यवस्था में जिला स्तर पर कार्यरत प्रतिनिधियों को क्षेत्र पंचायत सदस्यों की तुलना में उचित स्थान और स्रोत नहीं दिए जा रहे हैं, जिससे ग्रामीण विकास की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
संगठन के प्रदेश अध्यक्ष एडवोकेट भास्कर सम्मल की अध्यक्षता में हुई विशेष बैठक में, सदस्यों ने अपनी डिलीवर करने की रणनीति तय की और सरकार के समक्ष पांच प्रमुख मांगों की सूची रखी। इन मांगों में सबसे अहम पहलू प्रदेश में ‘जिला योजना समिति’ (DPC) के तत्काल गठन की जरूरत है, जो योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी में पारदर्शिता लाने में कारगर साबित हो सकती है। इसके अलावा, संगठन ने क्षेत्र पंचायत सदस्यों के समान ही जिला पंचायत सदस्यों को भी विकास कार्यों के लिए समान वित्तीय अधिकार और पर्याप्त धनराशि आवंटित करने की मांग उठाई है। संगठन का तर्क है कि वर्तमान वित्तीय सीमाएं उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी के अनुरूप प्रोजेक्ट्स चलाने में असमर्थ बना रही हैं।
वित्तीय बाधाओं के संदर्भ में, जिला पंचायत सदस्यों ने विकास कार्यों में लागू ‘2.50 लाख रुपये’ की बाध्यता और इससे जुड़ी जटिल टेंडरिंग प्रक्रिया को समाप्त करने की भी मांग की है। संगठन के अनुसार, यह निर्धारित सीमा सदस्यों को छोटे लेकिन आवश्यक स्थानीय विकास कार्यों को जल्दी से पूरा करने में समस्याओं का सामना करने पर मजबूर करती है, जिससे गांवों में विकास की गति धीमी पड़ जाती है। इसके साथ ही, 15वें वित्त आयोग के तहत जिलों को आवंटित धनराशि के उपयोग और कार्यों की गुणवत्ता की उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी प्रमुख रूप से रखी गई है, ताकि सड़कों और अन्य निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित हो सके और गद्दारी का कोई अवसर न बचे।
संगठन के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने एक सप्ताह के भीतर इन समस्याओं का समाधान नहीं किया और मांगों पर तत्काल ध्यान नहीं दिया, तो आंदोलन को और तीव्र और व्यापक रूप दिया जाएगा। 12 अक्टूबर को होने वाले प्रदर्शन में, सदस्य मुख्य विकास अधिकारी कार्यालयों के सामने धरने पर बैठेंगे और संबंधित जिलों के जिलाधिकारियों के माध्यम से मुख्यमंत्री को एक संयुक्त ज्ञापन सौंपा जाएगा। यह अभियान न केवल जिला पंचायत सदस्यों के अधिकारों के लिए, बल्कि पंचायती राज व्यवस्था को और मजबूत और प्रभावी बनाने के लिए किया जा रहा है, जिससे कि ग्रामीण विकास की वास्तविक जमीनी हक़ीकत सरकार तक पहुंच सके।
