उत्तराखंड की ऊंचाइयों में एक ऐसा धाम मौजूद है, जो समुद्र तल से 12,000 फीट की ऊंचाई पर बसा है। यह मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है—साल भर के 364 दिन इसके कपाट लोहे के भारी तालों से अंदर से बंद रहते हैं। आम दिनों में यहां न तो कोई घंटी की गुंजना सुनाई देती है, न ही कोई शंख, और न ही कोई भक्त इसकी धरती पर कदम रखता है।
हालांकि, जब रक्षाबंधन का पावन पर्व आता है, तो इस सुप्त मंदिर में अचानक हलचल शुरू हो जाती है। वशीनारायण मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और उर्गम घाटी के निवासी, विशेष रूप से महिलाएं, कठिन 12,000 फीट की चढ़ाई तय करके इस परमपुण्य स्थल पर पहुंचती हैं।
यह विषय जानने के लिए हैरान करने वाला है कि इन महिलाओं का ‘भाई’ कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु हैं। रक्षाबंधन के दिन, ये बहनें भगवान विष्णु की कलाई पर राखी बांधती हैं और अपने परिवार, गांव और पूरे जगत् की सुरक्षा तथा सुख-शांति की अर्चना करती हैं। जैसे ही यह पूजा पूर्ण होती है, शाम होते-होते मंदिर के कपाट पर फिर से ताला लगा दिया जाता है।
इस अनोखी परंपरा के पीछे एक गहरी पौराणिक कथा छिपी है, जो पाताल लोक से सीधे जुड़ी हुई है। मान्यताओं के अनुसार, दानवीर राजा बलि के घमंड ने तीनों लोकों को अस्त-व्यस्त कर दिया था। तब देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि के घमंड को चूर-चूर कर दिया।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, बाद में राजा बलि ने पाताल लोक में भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें अपने द्वारपाल (गुणगणन करने वाले रक्षक) के पद पर नियुक्त कर दिया। तब मां लक्ष्मी ने पति को मुक्ति दिलाने के लिए पाताल लोक में राजा बलि के हाथ में रक्षा सूत्र (राखी) बांधा और उन्हें भगवान विष्णु को द्वारपाल के पद से मुक्त करने का वचन दिलाया।
कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु धरती पर लौटे, तो उन्होंने इसी उर्गम घाटी में रक्षाबंधन के दिन पाताल लोक से प्रकट होकर अपनी विशेष पूजा करवाई। आज भी, इसी पौराणिक कथा का सम्मान करने के लिए स्थानीय बहनें भगवान विष्णु को अपने रक्षक और भाई मानकर राखी बांधने पहुंचती हैं। रक्षाबंधन के बाद, वशीनारायण मंदिर फिर से उसी अटूट सन्नाटे में डूब जाता है, जो अगले साल के पर्व तक जारी रहता है।
