इन दिनों देश भर में फॉर्म‑7 के थोक में गलत इस्तेमाल पर चर्चा तेज़ हो रही है, खासकर उत्तराखंड में गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान। इस पर कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) वी. अनबू कुमार का हालिया बयान ने पूरे देश में मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने बंगलुरु में यह स्पष्ट किया कि, एफआईआर दर्ज हो जाने के बावजूद, अब तक चुनावी पंजीकरण अधिकारियों (ERO) द्वारा थोक में जमा किए गए फॉर्म‑7 के मामलों में कोई जांच शुरू नहीं की गई है।
कर्नाटक में 16 जून से 4 अक्टूबर के बीच 91,000 से अधिक फॉर्म‑7 जमा हुए हैं, फिर भी विभागीय जांच की गति धीमी है। नियम के अनुसार, एक बार जांच शुरू होने पर जवाब देने के लिए केवल सात दिन का समय होता है। यदि जांच में देरी होती है, तो फर्जी दस्तावेज़ों के उपयोग पर कानूनी कड़ी कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है। पुलिस ने इन शिकायतों को गंभीरता से लिया है और भाजपा नेता व बूथ‑लेवल एजेंट (BLA) टी. श्रीनिवास मोथकुर पर 7,500 से अधिक मतदाताओं के नाम फर्जी तरीके से हटवाने की साजिश के आरोप में एफआईआर दर्ज किया है। यह केस भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 353 के तहत है, और राज्य में अब तक ऐसी छह FIRs दर्ज हो चुकी हैं।
इस बीच, चुनाव आयोग का प्रशासनिक ढांचा अपने ही अधिकारियों (EROs) द्वारा आंतरिक जांच शुरू होने का इंतजार कर रहा है। इस विरोधाभास ने सवाल उठाया है कि क्या उत्तराखंड में भी इसी गति से थोक फॉर्म‑7 के दुरुपयोग पर कार्रवाई हो पाएगी। उत्तराखंड के SIR अभियान के दौरान भी भाजपा कार्यकर्ताओं और बीएलए द्वारा बड़ी संख्या में फॉर्म‑7 दाखिल किए गए थे, जिन पर विपक्ष ने जाली दस्तावेज़ों और फर्जी हस्ताक्षरों के इस्तेमाल से वैध मतदाताओं के संवैधानिक अधिकार छीनने की साजिश का आरोप लगाया है।
कर्नाटक के CEO के बयान से यह स्पष्ट होता है कि सिर्फ फॉर्म‑7 जमा करने से किसी भी वैध मतदाता का नाम लिस्ट से नहीं हटता। जब तक संबंधित ERO स्तर पर व्यक्तिगत सुनवाई और मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) नहीं होता, तब तक नाम हटाने की कार्रवाई नहीं की जा सकती। इस परिस्थिति में, उत्तराखंड के चुनावी माहौल पर कर्नाटक की प्रशासनिक रुझान का प्रभाव कितना पड़ेगा, यह समय बताएगा।
