मैके में गंवरा दीदी, ससुराल से आए भिनज्यू – कुमाऊं का अनूठा त्योहार सातूं-आठूं

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कुमाऊं में गौरा-महेश की पूजा का लोकप्रिय पर्व सातूं-आठूं इस वर्ष अगस्त के अंतिम सप्ताह में मनाया जाएगा। यह त्योहार भादो मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी एवं अष्टमी को मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 24 से 26 अगस्त 2024 तक चलेगा।

शनिवार, 24 अगस्त को बिरुड पंचमी मनाई जाएगी। इस दिन बिरुड़ भिगोने का शुभ मुहूर्त प्रातः 6:30 से 11:40 तक रहेगा। अगले दिन रविवार, 25 अगस्त को सातूं (सप्तमी) का पर्व होगा, जिसका पूजन शाम 4:32 बजे के बाद किया जाएगा। सोमवार, 26 अगस्त को आठूं या दुर्वाष्टमी मनाई जाएगी, जिसका पूजन दोपहर 12:10 बजे तक किया जा सकेगा।

इस पर्व की मान्यता है कि सप्तमी को मां गौरा ससुराल से रूठकर अपने मायके आ जाती हैं, और उन्हें लेने के लिए अष्टमी को भगवान महेश (मैसर) यानी शिव आते हैं। इस अवसर पर सों नामक घास और धान के पौधों से गौरा-महेश की मूर्तियां बनाई जाती हैं, जिन्हें आकर्षक कुमाऊनी वस्त्रों एवं आभूषणों से सजाया जाता है।

कुमाऊं में भगवान शिव को ‘मैसर’ या ‘भिनज्यू’ (जीजा जी) और गौरा को ‘गंवरा दीदी’ के रूप में संबोधित किया जाता है, जो इस क्षेत्र के लोगों के देवी-देवताओं के साथ गहरे मानवीय संबंध को दर्शाता है। इस दौरान दीदी-जीजू से संबंधित लोकगीत ‘झोड़ा चांचरी’ के रूप में गाए जाते हैं।

महिलाएं दोनों दिन उपवास रखती हैं। अष्टमी की सुबह गौरा-महेश को बिरुड़ अर्पित किए जाते हैं, जिन्हें प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है। मंगल गीत गाते हुए मां गौरा को ससुराल के लिए विदा किया जाता है। अंत में, मूर्तियों को स्थानीय मंदिर या नौलों में विसर्जित किया जाता है।

यह त्योहार कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं का एक जीवंत उदाहरण है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।

लेखक: आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया, नैनीताल

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