हिमालयी प्रदेश उत्तराखंड में लगातार झटके महसूस किए जा रहे हैं, और इन छोटे‑छोटे झटकों के पीछे छिपा है एक बड़ा खतरा। 6 अक्टूबर की रात चमोली जिले में 4.9 मैग्नीट्यूड का भूकंप और 10 अक्टूबर को उत्तरकाशी में 4.2 मैग्नीट्यूड का झटका, दोनों ने इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को फिर से उजागर कर दिया। नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के अनुसार, चमोली में आए भूकंप का केंद्र लगभग 13 किमी गहराई पर स्थित था, जबकि वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के घुट्टू स्टेशन ने 4.8 मैग्नीट्यूड की तीव्रता दर्ज की। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस झटके का फोकस थराली के उत्तर में और बागेश्वर से लगभग 30 किमी उत्तर‑पश्चिम में था, जो हिमालय के सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र में आता है।
हिमालय में भूकंपों की मुख्य वजह भारतीय टेक्टोनिक प्लेट का हर साल लगभग 3‑4 सेमी उत्तर‑पूर्व दिशा में गति करना है। दो प्लेटों के बीच बढ़ता दबाव और घर्षण ऊर्जा को संचित कर देता है, जो समय‑समय पर भूकंप के रूप में मुक्त होती है। इस संदर्भ में चमोली में 1999 का 6.6 मैग्नीट्यूड और 2017 में रुद्रप्रयाग का 5.7 मैग्नीट्यूड वाला भूकंप याद दिलाता है कि बड़े‑पैमाने के भूकंपों का इतिहास प्रदेश में पहले ही दर्ज है।
भूवैज्ञानिक अध्ययन और पुरानी आँकड़ों के आधार पर विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि उत्तराखंड के हिमालयी भाग में 7.5 से 8 मैग्नीट्यूड तक के भूकंप की संभावना बनी हुई है। हालांकि सटीक समय का पूर्वानुमान लगाना अभी भी असंभव है, परन्तु कम गहराई पर होने वाले झटके अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। मानसून के दौरान भारी बारिश से पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा पहले से ही मौजूद है; यदि उसी समय बड़ा भूकंप आता है तो ढलानों की अस्थिरता और भी बढ़ जाएगी, जिससे जीवन और संपत्ति को गंभीर नुकसान हो सकता है।
चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जैसे जिलों को भूकंपीय जोन IV और V में वर्गीकृत किया गया है, जिससे इन क्षेत्रों की संवेदनशीलता और स्पष्ट हो जाती है। हालिया झटके न केवल चेतावनी स्वरुप हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में भूकंपीय जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्थानीय प्रशासन और जनता को इस बात से अवगत रहना चाहिए कि किसी भी क्षण बड़े भूकंप की संभावना बनी रहती है, और तैयारियों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता अत्यावश्यक है।
Original Title: कभी भी थर्रा सकता है उत्तराखंड!, बड़े भूकंप का खतरा!, वैज्ञानिकों ने किया सावधान
Original Content: उत्तराखंड में एक बड़े भूकंप का खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों ने बड़ी चेतावनी दी है। हिमालयी क्षेत्र में बड़े भूकंप का खतरा बना हुआ है। प्रदेश में पिछले एक हफ्ते में ही दो बार भूकंप आया है। गनीमत रही है कि इस भूकंप से किसी तरह के जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं मिली। लेकिन वैज्ञानिकों की माने तो खतरा टला नहीं है क्योंकि उत्तराखंड की धरती संवेदनशील है, और आगे बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
उत्तराखंड में आए दिन भूकंप के झटके हो रहे महसूस
उत्तराखंड, जहां आए दिन भूकंप के झटके महसूस होते हैं। हर झटका अपने साथ छोड़ एक बड़ा सवाल जाता है। सवाल है कि क्या हिमालय में किसी बड़े भूकंप की आहट है? 6 अक्टूबर की रात चमोली जिले में आए 4.9 मैग्नीट्यूड के भूकंप और 10 अक्टूबर को उत्तरकाशी में 4.2 मैग्नीट्यूड के भूकंप ने एक बार फिर इस खतरे की ओर ध्यान खींचा है। नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के मुताबिक, भूकंप का केंद्र चमोली जिले में था।
चमोली, उत्तरकाशी और फिर बागेश्वर में भूकंप
इसकी गहराई करीब 13 किलोमीटर दर्ज की गई। वहीं, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के घुट्टू स्टेशन पर भूकंप की तीव्रता 4.8 मैग्नीट्यूड रिकॉर्ड की गई। वैज्ञानिकों के मुताबिक, भूकंप का केंद्र थराली के उत्तर में और बागेश्वर से करीब 30 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में था। ये इलाका हिमालय के सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र में आता है। जहां भूगर्भीय हलचल के चलते समय-समय पर भूकंप आते रहते हैं।
हिमालय में भूकंप की प्रमुख वजह
अगर हिमालय में भूकंप की प्रमुख वजह की बात करें तो भारतीय प्लेट हर साल करीब 3 से 4 सेंटीमीटर उत्तर या उत्तर-पूर्व की दिशा में बढ़ रही है। दोनों प्लेटों के बीच दबाव और घर्षण से ऊर्जा जमा होती रहती है, जो समय-समय पर भूकंप के रूप में बाहर निकलती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, चमोली में 1999 में 6.6 मैग्नीट्यूड और 2017 में रुद्रप्रयाग क्षेत्र में 5.7 मैग्नीट्यूड का भूकंप भी आ चुका है।
पूरा हिमालयी क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय
ये घटनाएं बताती हैं कि पूरा हिमालयी क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय है। लेनिक सबसे बड़ी चिंता भविष्य में आने वाले बड़े भूकंप को लेकर है। वैज्ञानिक अध्ययनों और पुराने आंकड़ों के आधार पर उत्तराखंड हिमालय में 7.5 से 8 मैग्नीट्यूड तक के भूकंप की आशंका जताई जाती रही है।
कभी भी थर्रा सकता है उत्तराखंड!
हालांकि, भूकंप कब आएगा, इसकी सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कम गहराई पर आने वाले भूकंप नुकसान की आशंका बढ़ा सकते हैं। मानसून के दौरान भूकंप की चुनौती और बढ़ सकती है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में बारिश के कारण पहले से ही भूस्खलन का खतरा बना रहता है। ऐसे में अगर इसी दौरान बड़ा भूकंप आता है, तो पहाड़ों की ढलानों पर अस्थिरता बढ़ सकती है और भूस्खलन की घटनाएं तेज हो सकती हैं।
बड़े भूकंप का खतरा!
उत्तराखंड के चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जैसे जिले भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। राज्य के बड़े हिस्से को भूकंपीय जोन IV और V में रखा गया है। ऐसे में चमोली ओर उत्तरकाशी में आया ताजा भूकंप एक बार फिर चेतावनी देता है कि हिमालयी क्षेत्र में खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
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