उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय को फिर से विवाद की सड़कों पर ले जाया गया है, जब विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. शिवकुमार बरनवाल का एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस पत्र में उन्होंने कुलपति से अनुरोध किया है कि उन्हें कुलसचिव के पद से मुक्त किया जाए, क्योंकि वर्तमान प्रशासनिक दबाव, लंबित जांच, छात्रों के विरोध और कर्मचारियों की कमी के कारण उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। डॉ. बरनवाल ने स्पष्ट किया कि उनका कैरियर इस स्थिति से प्रभावित नहीं होना चाहिए और वे चाहते हैं कि किसी और सक्षम अधिकारी को इस पद पर नियुक्त किया जाए।
पत्र में डॉ. बरनवाल ने विश्वविद्यालय की वर्तमान स्थिति का वर्णन “जहाँ सर्जन की ज़रूरत है, वहाँ फ़िज़िशियन काम नहीं कर सकता” के रूप में किया, जिससे विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर नई बहस शुरू हो गई। उन्होंने 2018 से 2023 के बैच के छात्रों का भी उल्लेख किया, जिनके कथित तौर पर काउंसलिंग के नाम पर प्रवेश दिया गया था, और इन छात्रों के घर पर प्रदर्शन तथा आत्महत्या के प्रयास जैसी घटनाओं के कारण वे मानसिक रूप से अत्यधिक तनावग्रस्त महसूस कर रहे हैं। डॉ. बरनवाल ने कुछ कॉलेजों और वहाँ के कर्मचारियों के कथित कृत्यों को विश्वविद्यालय और सरकार की बदनामी का कारण बताया और आरोप लगाया कि इन मामलों पर अभी तक विवि स्तर पर प्रभावी निर्णय या कार्रवाई नहीं हुई है।
इसके अलावा, पत्र में डॉ. बरनवाल ने 2018 के एक मामले की ओर इशारा किया, जिसमें हाईकोर्ट की कई टिप्पणियाँ हुई थीं और मामला पीआईएल (पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन) में परिवर्तित हो चुका है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि जब तक इन मामलों पर अंतिम निर्णय नहीं होता, तब तक छात्रों के हितों के विरुद्ध किसी भी अनैतिक कदम की आशंका बनी रहेगी।
अंत में, वे परीक्षा और परिणाम से जुड़े निर्णयों के प्रति गंभीर कानूनी पेच की बात करते हैं। डॉ. बरनवाल का मानना है कि यदि परीक्षा के परिणाम घोषित किए जाते हैं या अंतिम निर्णय जारी किए जाते हैं, तो वे संबंधित मानकों के तहत आ सकते हैं, जिससे विश्वविद्यालय पर कानूनी जोखिम बढ़ सकता है। इस तरह के जटिल परिस्थितियों में उन्होंने एक सक्षम अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपने की मांग की है, ताकि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक और प्रशासनिक स्थिरता बनी रहे।
