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चंपावत की 2027 की जंग: कटे वोटों से बदले सत्ता के समीकरण, धामी की फिर से चुनौतियों की दहलीज

उत्तराखंड की कुमाऊँ मंडल में स्थित चंपावत विधानसभा सीट ने हमेशा से प्रदेश की सियासत में निर्णायक भूमिका निभाई है—जितने दल ने इस सीट को जीता, वही अगले पाँच सालों तक राज्य की सरकार का बैनर उठाया। 2002 में कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल ने पहली बार इस सीट को जीत कर मुख्यमंत्री पद पर पहुँचा, जबकि 2007 में भाजपा के बीना महाराना ने इसे छीन लिया और सत्ता में आए। 2012 में खर्कवाल का दोबारा विजय, 2017 में भाजपा के कैलाश चंद्र गहतोड़ी की 17,360 मतों के बड़े अंतर से जीत, और 2022 में वही गहतोड़ी ने 5,403 मतों के अंतर से फिर से जीत हासिल की, इस क्रम में चंपावत ने लगातार सत्ता परिवर्तन को दर्शाया। 2022 के उपचुनाव में, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी खटीमा सीट पर 55,000 से अधिक मतों के अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिससे इस क्षेत्र का महत्व और भी स्पष्ट हो गया।

चंपावत में मतदान का पैटर्न मुख्यतः क्षेत्रीय और जातीय गोलबंदी पर निर्भर करता है। यहाँ लगभग 55‑60 % मतदाता राजपूत (ठाकुर) वर्ग के हैं, 25‑30 % ब्राह्मण, और 12‑15 % अनुसूचित जाति से आते हैं। टनकपुर‑बनबसा जैसे मैदानी इलाकों और चंपावत‑पाटी जैसे शुद्ध पहाड़ी क्षेत्रों के विकास प्राथमिकताएँ अलग‑अलग हैं, जिससे मतदाता अपने क्षेत्रीय हितों के आधार पर मतदान करते हैं। इस विभाजन ने हमेशा स्थानीय मुद्दों—जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य सुविधाएँ, जिला अस्पताल में डॉक्टरों की उपलब्धता, युवाओं के लिए रोजगार अवसर, और टनकपुर‑बागेश्वर रेल लाइन—को चुनावी एजेंडा में प्रमुख बनाया है।

2027 के चुनाव से पहले प्री‑एसआईआर और एसआईआर के बाद चंपावत में 11,575 वोटों की कटौती सामने आई, जो 2022 में जीत‑हार के अंतर 5,403 से दो गुना से अधिक है। यह कटौती या तो मृत, पलायन या फर्जी प्रविष्टियों के कारण हो सकती है, और यदि यह किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय से अधिक हो तो दोनों प्रमुख दलों—भाजपा और कांग्रेस—के पारंपरिक वोट बैंकों पर गहरा असर पड़ेगा। इस परिदृश्य में, वास्तविक कैडर और सक्रिय मतदाता आधार वाले उम्मीदवार को जीत का बड़ा लाभ मिल सकता है।

टिकट की बात करें तो भाजपा से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का फिर से चंपावत से चुनाव लड़ना सबसे संभावित परिदृश्य है; यदि वह किसी अन्य सीट पर उतरते हैं तो कैलाश गहतोड़ी के परिवार या जिला संगठन के प्रमुख क्षत्रिय‑ब्राह्मण चेहरे टिकट की होड़ में आ सकते हैं। कांग्रेस में हेमेश खर्कवाल का पुनः प्रत्याशी बनना निश्चित है, पर युवा नेताओं की उभरती आवाज़ भी दावेदारी को जटिल बना रही है। अब दोनों दलों को 11,575 कटे वोटों को ध्यान में रखते हुए माइक्रो‑लेवल गणित को फिर से बिठाना पड़ेगा, ताकि 2027 में चंपावत की सत्ता का समीकरण फिर से बदल सके।

Original Title: CM धामी की चंपावत सीट पर 2027 की तैयारी, वोटर लिस्ट में बड़ी कटौती से बदले समीकरण

Original Content: उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं मंडल की चंपावत विधानसभा सीट ऐसी रही है कि जो दल यहां जीतता है वही सूबे की सियासत का सिकंदर हो जाता है। मगर, उत्तराखंड के आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, चंपावत में प्री-एसआर और एसआईआर के बाद आए कटे वोटों आंकड़ों ने सभी राजनीतिक दलों की नींद हराम कर दी है।

जो दल जीता उसी की प्रदेश में सरकार

चंपावत सीट के साथ यह संयोग ही है कि प्रदेश में जो भी दल चंपावत सीट हासिल करता है उसे ही प्रदेश की सत्ता हासिल होती है। 2002 में राज्य के पहले चुनाव में कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल ने जीत दर्ज की। कांग्रेस की सरकार बनी।  2007 में भाजपा की बीना महाराना ने जीत हासिल की और सीट कांग्रेस से छीन ली अब सरकार भाजपा की ही बनी। 2012 में कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल ने दोबारा वापसी की और बसपा उम्मीदवार मदन सिंह को हराकर जीत दर्ज की तो कांग्रेस को सत्ता हासिल हो गई।

2017 में भाजपा के कैलाश चंद्र गहतोड़ी ने एकतरफा मुकाबले में हेमेश खर्कवाल को 17,360 वोटों के बड़े अंतर से हराया तो भाजपा की सरकार बनी। 2022 के विधानसभा चुनाव में कैलाश चंद्र गहतोड़ी ने भाजपा के टिकट पर फिर से जीत दर्ज की और हेमेश खर्कवाल को 5,403 वोटों से हराया। संयोग देखिए कि प्रदेश की सरकार बदलने की परंपरा ही बदल गई और फिर से भाजपा को सूबे की सत्ता हासिल हो गई। 2022 में क्योंकि मुख्मंत्री धामी की खटीमा सीट पर अप्रत्याशित हार हुई तो कैलाश चंद्र गहतोड़ी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए अपनी सीट खाली कर दी। उपचुनाव में मुख्यमंत्री धामी ने एकतरफा मुकाबले में रिकॉर्ड 55,000 से अधिक वोटों के अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

क्षेत्रीय और जातीय गोलबंदी पर निर्भर है मतदान का ढर्रा

चंपावत में मतदान का ढर्रा मुख्य रूप से क्षेत्रीय और जातीय गोलबंदी पर निर्भर करता है। क्षेत्र में लगभग 55-60% आबादी राजपूत (ठाकुर) मतदाताओं की है, जबकि 25-30% ब्राह्मण मतदाता हैं। यहां लगभग 12-15% मतदाता अनुसूचित जाति वर्ग से आते हैं। यहां मतदाता की सोच भौगोलिक इलाके के हिसाब से भी तय होती है। मैदानी या अर्ध-पहाड़ी इलाके जैसे टनकपुर-बनबसा और शुद्ध पहाड़ी क्षेत्र यानी चंपावत और पाटी ब्लॉक के बीच विकास प्राथमिकताओं को लेकर मतदाता अलग-अलग सोच रखते हैं। यह उनके मतदान के समय के रुख में भी झलकता है।

स्थानीय मुद्दे और जनआकांक्षाएं

चंपावत विधानसभा क्षेत्र में सड़क और स्वास्थ्य सेवाएं के पहाड़ी क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और जिला अस्पताल में डॉक्टरों की उपलब्धता आज भी मुख्य मांग बनी हुई है। युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की कमी और पलायन आज भी सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है। वहीं पूर्णागिरी धाम और देवीधुरा जैसे धार्मिक स्थलों के विकास तथा टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन की मांग हमेशा चुनावी केंद्र में रहती है।

वोट कटने के आंकड़े और सियासी गणित पर असर

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के प्री एसआईआर और एसआईआर के बाद सामने आए आंकड़ों ने चुनाव विश्लेषकों को चौंका दिया है। चंपावत में 2022 के विधानसभा चुनाव में हार-जीत का अंतर 5,403 था। जबकि प्रीएसआईआर में 5,293 तो एसआईआर में 6,282 वोट यानी कुल मिलाकर 11,575 वोट कट चुके हैं जो कि जीत के अंतर से दोगुने से भी अधिक हैं। यदि ये कटे हुए वोट किसी एक विशेष विचारधारा या इलाकेया  समुदाय से जुड़े हैं, तो यह सीधे तौर पर 2027 का चुनावी परिणाम पलट सकते हैं। प्री-एसआईआर और एसआईआर में हटे वोट दर्शाते हैं कि पूर्व की मतदाता सूची में बड़ी संख्या में ऐसे नाम थे जो या तो स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं, मृत हैं, या फिर फर्जी/दोहरी प्रविष्टियों वाले थे। यदि मैदानी इलाकों (बनबसा-टनकपुर) में अधिक वोट कटे हैं, तो इसका असर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है। वहीं यदि पहाड़ी दूरस्थ क्षेत्रों से नाम हटे हैं, तो कांग्रेस के कैडर बेस पर इसका असर देखने को मिल सकता है। यानी 11,575 वोटों के हटने से अब वही उम्मीदवार

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।