आखिर क्यों UNESCO भी है उत्तराखंड की इस रामलीला का दीवाना?

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क्या आप हमारे उत्तराखंड की ऐसी रामलीला(Pauri Ramleela) के बारे में जानते हैं जिसकी चौपाइयां ठेठ पहाड़ी में गाई जाती हैं। ये कोई ऐसी-वैसी रामलीला नहीं है, बल्कि UNESCO की विश्व धरोहर में शामिल है। जी हां, आज हम आपको बताएंगे उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की रामलीला के बारे में, जहां होती है 125 साल से भी ज़्यादा पुरानी।

दुनिया की सबसे अनोखी रामलीला। चलिए इस आर्टिकल में जानते है वो 5 बातें जो इस रामलीला को और भी साख बनाती हैं। यकीनन एक उत्तराखंडी होने के नाते इसके बारे में जानकर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।

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128 साल पहले शुरू हुई पौड़ी की ये रामलीला Historic Pauri Ramleela

1897 में पौड़ी के कांडई गांव से ये रामलीला शुरु हुई। जिसे 1908 में एक भव्य रूप दिया गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पहले ये रामलीला आज की तरह दशहरे तक नहीं चलती थी। इसका स्वरूप बिल्कुल अलग था। पहले ये नौटंकी शैली में होती थी। जहां कलाकार गाते-गाते अपनी कहानी कहते थे। फिर पारसी थिएटर का दौर आया और पौड़ी की रामलीला ने भी खुद को बदला।

पुराने पर्दे हटे, नए सेट लगे और जब 1957 में पौड़ी में पहली बार बिजली आई। तो इस रामलीला का मंच रौशनी से ऐसा जगमगाया कि इसकी चमक दूर-दूर तक फैल गई। इस रामलीला की सबसे बड़ी खासियत है इसकी भाषा और संगीत। इस रामलीला में आपको हिंदी, उर्दू, संस्कृत और ब्रज भाषा के शब्द तो मिलेंगे ही साथ ही इसी चौपाइयां ठेठ गढ़वाली में पढ़ी जाती हैं।

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इस रामलीला का संगीत भी था खास

साथ ही इस रामलीला के संगीत को बागेश्री, मालकोस, और जौनपुरी जैसे मशहूर रागों पर तैयार किया गया है। पौड़ी की ये रामलीला सांस्कृतिक सौहार्द की भी निशानी है। इस रामलीला में सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोग भी सालों से हिस्सा लेते आए हैं।

पहली रामलीला जिसने महिला पात्रों को दिया मंच

आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि पूरे उत्तराखंड में पौड़ी की ये रामलीला पहली ऐसी रामलीला है, जिसने साल 2002 में महिला पात्रों को भी मंचन में शामिल किया। जी हां, पौड़ी की इस रामलीला में महिलाओं के किरदार महिलाएं ही निभाती हैं। ये परंपरा आज भी जारी है और समाज में महिलाओं की भागीदारी का एक सशक्त उदाहरण पेश करती है।

इस कहानी को UNESCO तक पहुंचाया

इन्हीं सब खासियतों की वजह से इस रामलीला ने सिर्फ उत्तराखंड का ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया। जब हमारी ये विरासत और प्रगतिशील सोच पहाड़ों से निकलकर दिल्ली पहुंची तो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की टीम भी इसे देखकर हैरान हो गई। उन्होंने पौड़ी की इस रामलीला पर रिसर्च की और इसकी कहानी दुनिया के सबसे पड़े मंच तक पहुंचाई।

पौड़ी की रामलीला बनी ग्लोबल हेरिटेज

फिर साल 2008 में दुनिया की सबसे बड़ी संस्था UNESCO ने इसे विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी। जी हां, यही से हमारी पौड़ी की रामलीला ग्लोबल हेरिटेज बन गई। इस कहानी को हर उत्तराखंडी के साथ SHARE जरूर कर दीजिएगा ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी भी अपनी इस विरासत पर गर्व कर सके।

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