उत्तराखंड सूचना आयोग के पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त डॉ. आर.एस. टोलिया के समय में, आदेश जारी होते ही शाम तक ही शासन द्वारा उनका पालन सुनिश्चित किया जाता था। आज वही आयोग के आदेशों को कई सरकारी अधिकारी अनदेखा कर रहे हैं, और इस बात का सबसे चौंकाने वाला उदाहरण हरिद्वार विकास प्राधिकरण (HRDA) से सामने आया है। HRDA के लोक सूचना अधिकारी प्रशांत कुमार सेमवाल पर सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जानकारी न देने के कारण 30,500 रुपये का जुर्माना लगाया गया, परन्तु पिछले तीन वर्षों में इस जुर्माने की एक भी राशि जमा नहीं हुई। यह असामान्य स्थिति न केवल आयोग की कार्यक्षमता पर सवाल उठाती है, बल्कि आम जनता के अधिकारों की सुरक्षा में भी गंभीर कमी को उजागर करती है।
इस मामले की बारीकियों को उजागर करने का श्रेय उत्तराखंड RTI क्लब (पंजीकृत) के सक्रिय सदस्य अजीत सिंह चौहान को जाता है। ज्वालापुर, हरिद्वार के रहने वाले अजीत ने 9 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड सूचना आयोग में एक RTI आवेदन दायर किया, जिसमें उन्होंने पूछा कि प्रशांत कुमार सेमवाल पर लगाए गए जुर्माने की कुल राशि और अब तक सरकार के खजाने में जमा हुई राशि क्या है। आयोग ने जवाब में बताया कि अपील संख्या 35920, 43624, 44490 और शिकायत संख्या 16247 के तहत 1 नवंबर 2023 से अब तक कुल 30,500 रुपये का जुर्माना तय किया गया था, लेकिन उनके रिकॉर्ड में अधिकारी द्वारा एक भी रुपये जमा कराने का कोई दस्तावेज या पत्राचार नहीं मिला। यह खुलासा यह संकेत देता है कि जुर्माना केवल कागज़ी औपचारिकता बन कर रह गया है।
जुर्माने की वसूली में इस तरह की लापरवाही ने नागरिकों के बीच गहरा निराशा का माहौल बना दिया है। जहाँ सामान्य करदाता या छोटे स्तर के सरकारी कर्मचारियों को देर से टैक्स या शुल्क देने पर तुरंत नोटिस और जुर्माना जारी किया जाता है, वहीं बड़े अधिकारी पर लगाए गए जुर्माने को तीन साल तक अनदेखा किया जा रहा है। यह दोहरी मानक न केवल प्रशासनिक नैतिकता को धूमिल करता है, बल्कि सूचना के अधिकार को लागू करने की प्रणाली में विश्वास को भी कमजोर करता है। यदि सूचना अधिकारी स्वयं ही आयोग के आदेशों को नजरअंदाज कर रहे हैं, तो आम जनता को समय पर और सटीक जानकारी मिलने की संभावना कितनी बनी रहेगी, यह प्रश्न बन गया है।
अजीत सिंह चौहान ने इस स्थिति को “अत्यधिक चिंताजनक” कहा और कहा कि यदि उच्च पदस्थ अधिकारी भी सूचना आयोग के आदेशों की अवहेलना कर सकते हैं, तो आम नागरिक की आवाज़ किस हद तक सुनी जाएगी। अब यह देखना होगा कि इस खुलासे के बाद राज्य सरकार और सूचना आयोग किस प्रकार की कड़ी कार्रवाई करेंगे, या फिर 30,500 रुपये का जुर्माना हवा में लटका रह जाएगा, जबकि अधिकारी अपनी कुर्सी पर ही आराम से बने रहेंगे। जनता की उम्मीद है कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, ताकि सूचना के अधिकार की भावना फिर से जीवित हो सके।
Original Title: हरिद्वार विकास प्राधिकरण के अफसर दिखा रहे सूचना आयोग के आदेशों को ठेंगा
Original Content: एक जमाना था डॉ. आरएस टोलिया का , जब वे उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त थे। वे दोपहर में आदेश करते तो कई बार शाम तक शासन उनके आदेश के पालन में शासनादेश जारी कर देता,मगर लगता है कि राज्य सूचना आयोग का इकबाल अब बुलंद नहीं रह गया है। अब हालत यह है कि सरकारी अफसर सूचना आयोग के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं। यूं तो सरकारी दफ्तरों में नियम-कानून आम जनता के लिए तो बहुत सख्त होते हैं, लेकिन जब बात खुद अधिकारियों पर आती है, तो सारे नियम हवा में उड़ते दिखाई देते हैं। ऐसा ही एक मजेदार और चौंकाने वाला मामला हरिद्वार विकास प्राधिकरण (HRDA) से सामने आया है, जहाँ के लोक सूचना अधिकारी सूचना आयोग के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं।
जुर्माना 30,500 रुपये पर जमा न हुई फूटी कौड़ी !
ऐसा ही एक मजेदार और चौंकाने वाला मामला हरिद्वार विकास प्राधिकरण (HRDA) से सामने आया है, जहाँ के लोक सूचना अधिकारी सूचना आयोग के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं। मामला यह है कि सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जानकारी न देने पर उत्तराखंड सूचना आयोग ने एचआरडीए (HRDA) के लोक सूचना अधिकारी प्रशांत कुमार सेमवाल पर 30,500 रुपये का भारी-भरकम जुर्माना ठोका था। लेकिन साहब की दबंगई या फिर व्यवस्था की लाचारी देखिए कि पिछले तीन सालों में इस जुर्माने का एक रुपया भी जमा नहीं कराया गया।
RTI के खुलासे से खुली पोल
इस पूरे मामले की पोल आरटीआई क्लब उत्तराखंड (पंजीकृत) के सक्रिय सदस्य अजीत सिंह चौहान ने खोली है। ज्वालापुर, हरिद्वार के रहने वाले अजीत सिंह चौहान ने उत्तराखंड सूचना आयोग में एक RTI अर्जी दाखिल करके पूछा था कि अधिकारी पर कितना जुर्माना लगा और उसमें से कितनी रकम सरकारी खजाने में जमा हुई। सूचना आयोग की तरफ से 9 अक्टूबर 2026 को जो जवाब मिला, उसे देखकर कोई भी हैरान रह जाए। आयोग ने साफ-साफ बताया कि लोक सूचना अधिकारी प्रशांत कुमार सेमवाल के खिलाफ अपील संख्या 35920, 43624, 44490 और शिकायत संख्या 16247 के तहत1 नवंबर 2023 से लेकर अब तक सूचना न देने के जुर्म में कुल 30,500 रुपये का जुर्माना लगाया गया। लेकिन जब आयोग से पूछा गया कि क्या अधिकारी ने यह जुर्माना भरा? तो आयोग का जवाब था कि उनके रिकॉर्ड में अधिकारी द्वारा एक भी रुपया जमा कराने का कोई पत्राचार या सबूत दर्ज ही नहीं है।
क्या जुर्माना सिर्फ कागजी औपचारिकता है?
इस खुलासे के बाद अब जनता और आरटीआई कार्यकर्ताओं के मन में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या सूचना आयोग द्वारा लगाया जाने वाला जुर्माना सिर्फ कागजों तक ही सीमित है? ना तो हरिद्वार विकास प्राधिकरण इस बात को लेकर गंभीर दिख रहा है कि उनके अधिकारी पर लगे जुर्माने को जमा कराया जाए, और ना ही उत्तराखंड सूचना आयोग इस वसूली को लेकर कोई सख्त रवैया अपना रहा है। आयोग जुर्माना लगा देता है, लेकिन उसकी वसूली कैसे होगी—इस पर सब मौन धारण कर लेते हैं। अगर कोई आम आदमी जरा सा टैक्स या सरकारी फीस देने में देरी कर दे, तो विभाग तुरंत नोटिस जारी कर देता है, जुर्माना ठोक देता है या फिर कुर्की की धमकी देने लगता है। लेकिन जब किसी बड़े अफसर पर हजारों का जुर्माना लगता है, तो सालों तक फाइलें दबाकर रख ली जाती हैं और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता।
जनता का भरोसा टूट रहा
आरटीआई कार्यकर्ता अजीत सिंह चौहान का कहना है कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। अगर लोक सूचना अधिकारी ही सूचना आयोग के आदेशों को नजरअंदाज करेंगे और जुर्माना जमा नहीं करेंगे, तो आम नागरिक को समय पर जानकारी कैसे मिलेगी? इससे तो यही संदेश जाता है कि अधिकारी चाहे सूचना दबाएं या आयोग के आदेशों की धज्जियां उड़ाएं, उनका कोई कुछ नहीं कर सकता। अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद क्या शासन-प्रशासन की नींद खुलती है या फिर ₹30,500 का यह जुर्माना यूं ही हवा में लटका रहेगा और अफसर मजे से अपनी कुर्सी पर बने रहेंगे।
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