उत्तराखंड के देहरादून जिले के सीमांत जौनसार‑बावर क्षेत्र में पारंपरिक रूप से निवास कर रहे मुस्लिम चरवाहे समुदाय “वन गुज्जरों” का अस्तित्व अब खतरे में पड़ गया है। क्षेत्र में कथित जनसांख्यिकीय बदलाव और “बाहरी मुस्लिम आबादी” के बसावट के खिलाफ उग्र अभियान चलाने वाले हिंदुत्ववादी संगठनों की शिकायतों के बाद, प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए आठ वन गुज्जर परिवारों के घरों को ध्वस्त कर उन्हें बेदखल कर दिया। इसके साथ ही, त्यूनी और चकराता तहसील क्षेत्रों में रह रहे लगभग एक दर्जन अन्य गुज्जर परिवारों को नोटिस जारी कर अपनी जमीनों की वैधता साबित करने के निर्देश दिए गए। इस कार्रवाई से पूरे क्षेत्र में वन गुज्जर समुदाय के बीच डर, असुरक्षा और विस्थापन का माहौल बन गया है।
मुद्दा रुद्र सेना के अध्यक्ष मनोज बिजल्वाण और हिंदुत्ववादी संगठन से जुड़े राकेश तोमर उत्तराखंडी द्वारा दायर शिकायतों से उत्पन्न हुआ। शिकायतों के अनुसार, जौनसार‑बावर के त्यूनी तहसील क्षेत्र में वन गुज्जरों ने लगभग 700 बीघा कीमती सरकारी और वन भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा है। उन्होंने 1983 में राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर यह जमीन बाहरी लोगों के नाम दर्ज की गई थी, जो 1967 में जौनसार‑बावर को “अनुसूचित जनजाति (ST) क्षेत्र” घोषित किए जाने के नियमों का उल्लंघन है। देहरादून के जिलाधिकारी आशीष चौहान के निर्देश पर SDM ने “उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम” की धारा 211 के तहत कानूनी कार्यवाही शुरू की और परिवारों को नोटिस थमा दिए।
16 अक्टूबर को चकराता और त्यूनी तहसील परिसरों में नोटिस सुनवाई के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई। रुद्र सेना के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में वहाँ एकत्र हुए और वन गुज्जरों पर “जिहादी”, “घुसपैठिए”, “बांग्लादेशी” और “देशद्रोही” जैसी अपमानजनक बातें चिल्लाई गईं। एक गुज्जर युवक ने मोबाइल से विरोध‑प्रदर्शन की रिकॉर्डिंग करने का प्रयास किया, जिससे दोनों पक्षों के बीच धक्का‑मुक्की हुई। पुलिस ने दो गुज्जर युवकों के खिलाफ मामला दर्ज किया और एक को शांति भंग के आरोप में हिरासत में ले लिया।
वन गुज्जरों ने स्थानीय वकीलों पर दबाव डालने के आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें कानूनी सहायता नहीं मिल रही है। मुस्लिम सेवा संगठन के उपाध्यक्ष आकिब कुरैशी ने कहा, “वन गुज्जर पीढ़ियों से उत्तराखंड के जंगलों में रहते आ रहे हैं। केवल उनके मुस्लिम होने के कारण उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। प्रशासन को निष्पक्षता से काम करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।” समुदाय के प्रतिनिधियों ने 1951‑52 से इस क्षेत्र में रह रहे अपने परिवारों के जीवन को “वनाधिकार अधिनियम, 2006” के तहत मान्य करने का दावा किया और नैनीताल उच्च न्यायालय के एक पूर्व आदेश का हवाला दिया, जो वनाधिकार कानून के तहत लंबित दावों वाले वन गुज्जरों को जबरन बेदखली से सुरक्षा देता है।
19 अक्टूबर को वन गुज्जरों के प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी आशीष चौहान से मुलाकात की और त्यूनी व चकराता तहसीलों में चल रहे मामलों को विकासनगर या देहरादून स्थानांतरित करने का अनुरोध किया। प्रशासन ने अभी तक इस आवेदन पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। आगामी उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह घटना राजनीतिक चश्मे से भी देखी जा रही है, जबकि कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह ने इस विवाद पर अभी तक सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
