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उत्तराखंड शहरी विकास विभाग में घुसपैठ का नया साम्राज्य: रिटायरमेंट से सात दिन पहले ही तय हो गया 2.5 लाख का पैकेज, बेरोजगार संघ का अल्टीमेटम

उत्तराखंड के शहरी विकास विभाग में इन दिनों ऐसी हलचल मची है, जैसे किसी गंभीर सैक्यूरिटी सेंसेशन में हंगामा फैला हो। सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और पारदर्शिता के उद्घोषों के बीच, विभाग में हुई एक संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) नियुक्ति ने पूरे प्रशासनिक संदर्भ पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला ‘रवि पांडे’ नाम के एक पूर्व अधीक्षण अभियंता की नियुक्ति से जुड़ा है, जिसे लेकर उत्तराखंड बेरोजगार संघ आर-पार के मूड में है। संगठन ने शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा, आईएएस सचिव नितेश झा, संयुक्त सचिव महावीर सिंह चौहान और निदेशक विनोद गोस्वामी को अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि तुरंत कार्रवाई नहीं की गई, तो निदेशालय में तालाबंदी और उग्र आंदोलन किया जाएगा।

सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों से जो तस्वीर सामने आई है, वह चिंताजनक है। आरोप है कि चयन की शर्तें इतनी खास तौर पर बनाई गईं कि केवल एक ही व्यक्ति, यानी रवि पांडे ही इसके दायरे में आ सकें। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पूरे प्रक्रिया में केवल रवि पांडे का ही एकमात्र आवेदन आया था। नियमों के अनुसार, जब केवल एक आवेदन प्राप्त होता है, तो प्रतियोगिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए प्रक्रिया दोबारा शुरू की जानी चाहिए थी, लेकिन अधिकारियों ने इस नजरअंदाज करते हुए सीधे नियुक्ति पर मुहर लगा दी।

समय की रफ्तार भी इस मामले में संदिग्ध लगती है। 29 मार्च 2026 को विज्ञापन जारी हुआ, 15 अप्रैल को अंतिम तिथि थी, और 17 अप्रैल को ही सिफारिश तैयार हो गई। 24 अप्रैल को रवि पांडे ने पद संभालने की सहमति दी, जबकि 30 अप्रैल को ही वे अपने नियमित सरकारी पद से रिटायर हुए। यानी, सरकारी सेवा में सक्रिय रहते हुए और रिटायरमेंट से महज सात दिन पहले ही उन्हें नया पद और सुविधाएं प्रस्तावित कर दी गईं। इस सहमति पत्र में मासिक मानदेय 2.50 लाख रुपये और वार्षिक वेतनवृद्धि (इंक्रीमेंट) 25,000 रुपये की भारी-भरकम शर्त शामिल है, जिसकी वैधता को लेकर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।

बेरोजगार संघ का तर्क यह भी है कि रवि पांडे के पूर्व कार्यकाल में लापरवाही का साया बना रहा। जब वे अधीक्षण अभियंता थे, तब राज्य में कचरा प्रबंधन की 21 परियोजनाएं ठप हो गई थीं और 22 करोड़ रुपये का बजट केंद्र सरकार को वापस लौटाना पड़ा था। ऐसे में, बिना किसी प्रदर्शन समीक्षा के उन्हें फिर से विभाग में शामिल करने का कारण स्पष्ट नहीं है। संघ ने विभाग से सात प्रमुख सवाल पूछे हैं, जिनमें इस ‘टेलर-मेड’ प्रक्रिया की जांच, एकल आवेदन के बावजूद प्रतियोगिता न कराने की वजह, और पूर्वकालिक असफलताओं की जिम्मेदारी शामिल है।

अब नजारा यह है कि यदि शहरी विकास मंत्री और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आदेशों के बावजूद यह अवैध नियुक्ति नहीं रद्द की जाती और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती, तो बेरोजगार संघ सड़कों पर उतरकर तालाबंदी की धमकी दे रहा है। यह मामला न केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति का सवाल है, बल्कि राजकीय नौकरियों में मौजूदा प्रणाली की पारदर्शिता और नियमों के पालन की कसौटी भी है।

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।