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उत्तराखंड वन विभाग में भड़की आग: वरिष्ठ IFS अधिकारी पर अभद्र भाषा का आरोप, फिर भी अपराधी को मिला केंद्रीय पद और प्रमोशन

उत्तराखंड शासन और वन विभाग की प्रशासनिक इतिहास में एक बेहद विवादास्पद और शर्मनाक अध्याय दर्ज हो गया है, जहां अनुशासन और नियमों की धज्जियां उड़ाने वाला मामला न केवल अनसुना गया, बल्कि दोषी अधिकारी को बड़े पदों पर पदोन्नत कर दिया गया। इस घटनाक्रम में, 2017 बैच के तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) कुंदन कुमार के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए कि उन्होंने अपने वरिष्ठ और नियंत्रक अधिकारी, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता वरिष्ठ IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के खिलाफ शासकीय पत्रों में अमर्यादित, असंसदीय और अभद्र भाषा का प्रयोग किया। प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) डॉ. समीर सिन्हा की अति-गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार, कुंदन कुमार ने न केवल अपने वरिष्ठ का व्यक्तिगत चरित्र हनन किया, बल्कि मातहत कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने और सरकारी कामकाज को ठप करने के लिए उकसाने का भी प्रयास किया। यह व्यवहार अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमावली, 1968 के नियम 3 और 9 का सीधा उल्लंघन माना गया, जो किसी भी ऑल इंडिया सर्विस अधिकारी के लिए अस्वीकार्य है।

हालांकि, यह मामला शासन स्तर की आखों-मूंदी नीतियों को प्रकट करने वाला सबसे चौंकाने वाला तथ्य प्रस्तुत करता है। जबकि HoFF ने 18 अक्टूबर 2025 को प्रमुख सचिव (वन एवं पर्यावरण) को पत्र लिखकर आरोपी अधिकारी के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की स्पष्ट सिफारिश की थी, शासन ने इसे नजरअंदाज कर दिया। फाइल को लगभग 70 दिनों तक दबाए रखने के बाद, विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) ने इस गंभीर आरोप को ‘क्लीन चिट’ मानते हुए कुंदन कुमार को कनिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड (JAG – Level 12) में प्रमोट कर दिया। इसका शिखर जुलाई 2026 में छू, जब केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने उन्हें देहरादून स्थित प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (IGNFA) में 4 वर्षों के लिए एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति (Central Deputation) दे दी। यह तथ्य कि आरोपी को केंद्र में भेजने से पहले वीजिलेंस क्लीयरेंस मिल चुकी थी, यह प्रमाणित करता है कि कोई सक्रिय जांच लंबित नहीं थी, जिसने वन विभाग के ‘जांच पेंडिंग’ के बहाने को और बेबुनियाद कर दिया।

इस प्रशासनिक अन्याय से आहत होकर संजीव चतुर्वेदी ने 21 जनवरी 2026 को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत 7 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी, जिसमें DPC के फैसले और जांच के दस्तावेज शामिल थे। जब विभाग द्वारा समय पर जानकारी नहीं दी गई, तो उन्होंने प्रथम अपील और बाद में राज्य सूचना आयोग (State Information Commission) में द्वितीय अपील दर्ज की। मुख्य सूचना आयुक्त ने जन सूचना अधिकारी (PIO) के तर्क को स्वीकार करते हुए, जिसमें कहा गया था कि यह ‘व्यक्तिगत सूचना’ है और जांच चल रही है, केवल 2 बिंदुओं पर सीमित जानकारी देने का आदेश दिया। इस ढुलमुल रुख ने संजीव चतुर्वेदी को कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया है।

अब, वरिष्ठ IFS अधिकारी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं, जिसके लिए उनके पास मजबूत विधिक आधार मौजूद हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के ‘भगत सिंह बनाम मुख्य सूचना आयुक्त’ के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, सिर्फ ‘जांच लंबित’ होना सूचना रोकने का वैध कारण नहीं है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के ‘भजान सिंह बनाम उत्तराखंड सरकार’ के फैसले के तहत, DPC से किसी अधिकारी के खिलाफ लंबित गंभीर आरोपों की जानकारी छिपाना गैर-कानूनी है। विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी पत्रों में अभद्र भाषा और मातहतों को भड़काना व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित (Public Interest) से जुड़ा मामला है। अदालत में पहुंचने से न केवल मुख्य सूचना आयुक्त के आदेश की न्यायिक समीक्षा होगी, बल्कि उन वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यशैली भी प्रकाश में आएगी जिन्होंने अनुशासनहीनता को प्रोत्साहित करने में आंखें मूंद रखीं। यह मामला अब उत्तराखंड के प्रशासनिक व्यवस्था को घेरने वाली एक बड़ी कानूनी और नैतिक परीक्षा बन गया है।

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।

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