उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊँ मंडल की चंपावत विधानसभा सीट ने हमेशा वही दल को सियासत की कुंजी दी है जो यहाँ जीतता है। 2002 में कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल की जीत के साथ राज्य में कांग्रेस का शासन शुरू हुआ, फिर 2007 में भाजपा की बीना महाराना ने इस सीट को छीन कर पहली बार भाजपा को सत्ता दिलाई। 2012 में खर्कवाल फिर से लौट आए, बसपा के मदन सिंह को हराकर कांग्रेस को फिर से सत्ता मिली। 2017 में भाजपा के कैलाश चंद्र गहतोड़ी ने खर्कवाल को 17,360 वोटों के बड़े अंतर से मात दी और पार्टी को फिर से सरकार का अधिकार मिला। 2022 के चुनाव में गहतोड़ी ने वही टिकट पर 5,403 वोटों से खर्कवाल को परास्त किया, पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की खटीमा सीट पर अप्रत्याशित हार के बाद गहतोड़ी ने अपनी सीट खाली कर दी। उपचुनाव में धामी ने रिकॉर्ड 55,000 से अधिक मतभेद से ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिससे चंपावत की सत्ता‑संबंधी परंपरा फिर से बदल गई।
चंपावत में मतदान का ढर्रा मुख्यतः क्षेत्रीय और जातीय गोलबंदी पर निर्भर करता है। यहाँ लगभग 55‑60 % मतदाता राजपूत (ठाकुर) वर्ग के हैं, 25‑30 % ब्राह्मण और 12‑15 % अनुसूचित जाति से आते हैं। मैदानी‑बनबसा‑टनकपुर क्षेत्रों की विकास प्राथमिकताएँ पहाड़ी‑चंपावत‑पाटी ब्लॉक से अलग रहती हैं, जिससे मतदाता के रुख में भी अंतर स्पष्ट होता है। इस विविधता के बीच सड़क, स्वास्थ्य सुविधाओं, डॉक्टरों की उपलब्धता, युवा रोजगार की कमी और पलायन जैसी स्थानीय समस्याएँ ही चुनावी मुद्दों के केंद्र में बनी रहती हैं। साथ ही पूर्णागिरी धाम, देवीधुरा जैसे धार्मिक स्थलों का विकास और टनकपुर‑बागेश्वर रेल लाइन की मांग भी मतदरों के ध्यान में रहती है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले प्री‑एसआईआर और एसआईआर के बाद उजागर हुए वोटर‑लिस्ट कटौती ने सभी दलों को झकझोर दिया है। 2022 में धामी‑गहतोड़ी के बीच 5,403 वोटों का अंतर था, जबकि प्री‑एसआईआर में 5,293 और एसआईआर में 6,282 वोट हटे—कुल मिलाकर 11,575 वोटों की कटौती, जो जीत‑हार के अंतर से दो‑गुना अधिक है। यदि ये कटे हुए नाम विशेष समुदायों या क्षेत्रों से जुड़े हैं, तो यह 2027 के परिणाम को उलट‑पलट कर सकता है। मैदानी क्षेत्रों में अधिक कटौती होने पर भाजपा के पारम्परिक वोट‑बैंक पर असर पड़ेगा, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में कटौती कांग्रेस के कैडर को कमजोर कर सकती है। इस प्रकार अब वही उम्मीदवार जीत सकता है जिसके पास वास्तविक, सक्रिय मतदाता आधार हो।
टिकट की लड़ाई अभी तक गरम नहीं हुई है, पर 2027 में चंपावत का दांव बड़ा होगा। भाजपा से उम्मीद है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी फिर से इसी सीट से चुनाव लड़ेगा; यदि धामी किसी अन्य क्षेत्र में उतरते हैं, तो गहतोड़ी के परिवार या जिला संगठन के प्रमुख राजपूत‑ब्राह्मण चेहरे टिकट के लिए उभर सकते हैं। कांग्रेस में हेमेश खर्कवाल अभी भी सबसे मजबूत दावेदार हैं, पर युवा नेताओं और स्थानीय जिलाध्यक्षों की नई आवाज़ें भी टिकट की होड़ में प्रवेश कर रही हैं। कुल मिलाकर, 11,575 वोटों की कटौती चंपावत में 2027 के चुनाव का प्रमुख ‘एक्स‑फ़ैक्टर’ बन चुकी है, और सभी दलों को अपने माइक्रो‑लेवल गणित को पुनः परखना पड़ेगा।
