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साहित्य गौरव पुरस्कार विजेता प्रो. बटरोही का सीएम धामी को भावुक पत्र: कैंची धाम के जाम और धार्मिक व्यवसायीकरण के विरोध में उठी आवाज

उत्तराखंड के साहित्यिक और सामाजिक मंच पर नई बहस छेड़ने वाले 81 वर्षीय वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार और कथाकार प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को एक तीखा और भावुक पत्र लिखा है। उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रदान किए जाने वाले सबसे प्रतिष्ठित ‘साहित्य गौरव सम्मान’ से अलंकृत यह वरिष्ठ लेखक, जो कुमाऊँ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष भी हैं, ने प्रदेश में धार्मिक प्रतीकों के बढ़ते हुए व्यवसायीकरण और कैंची धाम के कारण आम जनता को झेलनी पड़ रही भीषण यातायात समस्या पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। प्रो. बटरोही ने स्पष्ट किया है कि सत्ता के गलियारों में बहस न करने वाले शांत साधक की छवि बनाए रखने वाले एक लेखक के लिए, यह जीवन में पहली बार है जब उन्होंने किसी शासनाध्यक्ष को पत्र लिखने के लिए विवश महसूस किया है। पर्वतीय अंचल और नैनीताल के बिगड़ते स्वरूप ने ही उन्हें अपनी मौनता तोड़ने और आवाज उठाने पर मजबूर किया है।

प्रो. बटरोही के पत्र में धार्मिक स्थलों के आर्थिकरण (commercialization) को लेकर एक चेतावनीपूर्ण नोट बजाया गया है। उन्होंने लिखा है कि आस्था के नाम पर पवित्र संरचनाओं को भ्रष्ट चोलाधारियों के चंगुल में फंसाने की यह प्रवृत्ति आने वाले समय में शासन-प्रशासन के लिए ‘भस्मासुर’ का रूप ले सकती है। उन्होंने अपने 81 वर्षों के जीवन का हवाला देते हुए कहा कि जिस नैनीताल की धरती पर उनके संस्कार अंकुरित हुए थे, आज उसी खूबसूरत क्षेत्र को अपनी आँखों के सामने विखंडित और कुरूप होते देखना उन्हें बेहद पीड़ादायक लग रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री से सलाह भी दी है कि वे 1960 से 1966 के बीच देश की चर्चित पत्रिकाओं ‘सरिता’ और ‘मुक्ता’ में प्रकाशित हुई खोजी रपटें पढ़ें, जिनमें उस दौर के शीर्ष पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने कैंची धाम के उभरते कारोबारी स्वरूप के विरोध में बेबाकी से अपनी राय रखी थी।

पत्र का मुख्य फोकस नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर कैंची धाम के आसपास बनने वाले अंतहीन ट्राफिक जाम से आम जनता का दर्द है। प्रो. बटरोही ने उदास होकर लिखा कि इस कुव्यवस्था के कारण यात्रियों की ट्रेनें और बसें छूट रही हैं, लोग अपनों से समय पर नहीं मिल पा रहे और मानसिक अवसाद के शिकार हो रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब नैनीताल के सिनेमाघरों में अरबों के कारोबार वाली फिल्में चल रही हैं, तो आम आदमी की सुरक्षा और शांति की चिंता करना कौन सुन रहा है? उन्होंने मुख्यमंत्री से विनती की है कि उन्हें प्रदेश के मुखिया के तौर पर आम आदमी के अस्तित्व और सुरक्षा की चिंता करनी चाहिए, न कि केवल धार्मिक कारोबार को बढ़ावा देना।

पत्र के अंत में, प्रो. बटरोही ने अपनी मर्यादा और शांति की कामना को साझा करते हुए एक हृदयस्पर्शी अपील की। उन्होंने कहा, “अब इस बुढ़ापे में मुझे नए सिरे से पूजा-पाठ और कर्मकांड के लिए मजबूर न करें। मैं अपने बचे-खुचे दिन शांति और सुकून से बिताना चाहता हूँ, कृपया इसमें मेरी मदद करें।” प्रो. बटरोही, जिन्हें पर्वतीय जीवन, विस्थापन और कुमाउनी लोक-संस्कृति पर लिखे गए कालजयी उपन्यासों और शोध ग्रंथों के लिए जाना जाता है, ने 21 फरवरी 2024 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाषा मंत्री सुबोध उनियाल के हाथों ‘उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान’ के तहत ‘सुमित्रा नंदन पंत पुरस्कार’ प्राप्त किया था। यह पत्र उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा के साथ-साथ सामाजिक चेतना की एक मजबूत झलक है, जिसने राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में गहरे प्रभाव को जताया है।

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।

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