उत्तराखंड में चल रहे डिजिटल क्रप सर्वे (DCS) एवं किसान पंजीकरण (Farmer Registry) अभिनेत्रियों द्वारा सतर्कता बरतने वाली कर्मचारी वर्ग की समस्याएं अब गंभीर रूप धारण कर रही हैं। पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में व्यावहारिक और तकनीकी बाधाओं के चलते जमीनी स्तर पर काम अवरुद्ध होने की स्थिति को देखते हुए, ‘राज्य संयुक्त कर्मचारी परिषद’ ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर अपनी आवाज उठाई है। परिषद ने राज्य की मुख्य सचिव से मुलाकात कर इस संकट पर तुरंत दखल देने और स्थायी समाधान निकालने की मांग की है। परिषद का मानना है कि बिना उचित संसाधन और तकनीकी समर्थन के, इन नागरिक कर्मचारियों पर लाद गया कार्यभार न केवल असंभव है, बल्कि यह किसानों तक सरकारी सेवाओं के सही वितरण को भी प्रभावित कर सकता है।
प्रदेश अध्यक्ष अरुण पांडेय के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य सचिव के समक्ष अधीनस्थ कृषि सेवा संघ की गंभीर शिकायतें रखीं। उन्होंने उल्लेख किया कि इस समस्या को लेकर पहले भी उच्च अधिकारियों को लिखित रूप में सूचित किया गया था और कई बैठकों में चर्चा भी हुई थी, परंतु जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस या प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है। अब परिषद की मांग है कि मुख्य सचिव संबंधित विभागों के अधिकारियों की एक उच्चस्तरीय बैठक तुरंत बुलाएं, जहां तकनीकी और लॉजिस्टिक बाधाओं का स्थायी समाधान निकाला जाए। इससे न केवल कर्मचारियों पर बिना वजह का दबाव कम होगा, बल्कि किसान पंजीकरण और डिजिटल सर्वे का प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के पूरा हो पाएगा।
कर्मचारियों के सामने की गई चुनौतियों का विश्लेषण किया जाए, तो सबसे बड़ी बाधा ‘सिग्नल का अभाव’ है। उत्तराखंड के कई पहाड़ी और दूर-दराज़ क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्किंग की कमी के कारण ऑनलाइन डेटा एंट्री और सर्वे का काम पूरी तरह ठप्प हो जाता है। इसके अलावा, सरकारी राजस्व नक्शों और जमीन की वास्तविक स्थिति में भारी अंतर पाया जा रहा है, जिससे भूमि की पहचान और रिकॉर्डिंग में गलतफहमी का दायरा बढ़ रहा है। मौसमी कठिनाइयां, विशेष रूप से बारिश के मौसम में उफनते नदियों और खराब सड़कों के बीच खेतों तक पहुंचना, कर्मचारियों के लिए एक जोखिम भरा सफर बन चुका है।
इनके साथ ही, कार्यभार के मुकाबले संसाधनों की भारी कमी एक और बड़ी समस्या है। परिषद के प्रदेश प्रवक्ता हर्ष जोशी ने बताया कि अधिकारियों ने पहले भी समस्याओं के समाधान का भरोसा दिया था, परंतु नतीजे अभी भी शून्य पर ही हैं। वर्तमान में, काम का बोझ इतना अधिक है कि उपलब्ध मैनपावर और तकनीकी उपकरणों से उसका निपटारा संभव नहीं है। इसलिए, परिषद की यह गुहार शायद अब तक की सबसे मजबूत आवाज है, जिसका उद्देश्य प्रशासनिक लापरवाही को रोकना और नई तकनीकी पहल को सफल बनाना है, ताकि किसानों का हक सुरक्षित रहे और डिजिटल रिकॉर्डिंग प्रक्रिया निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सके।
