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उत्तराखंड में जल संकट पर ब्रेक: नहर पानी की चोरी पर जुर्माना, ढांचे को नुकसान तो छह महीने की सजा

उत्तराखंड सरकार ने राज्य के जल संसाधनों की सुरक्षा और प्रभावी प्रबंधन के लिए एक कठोर कदम उठाते हुए नहरों और पारंपरिक गूलों के पानी के अनधिकृत उपयोग पर सख्त प्रतिबंधित व्यवस्था लागू करने की तैयारी कर ली है। इस नई नीति के तहत, सिंचाई नहरों से बिना आवश्यक अनुमति पानी निकालने या ‘चोरी’ करने पर संबंधित व्यक्तियों को भारी जुर्माना देना होगा। सरकार का मुख्य उद्देश्य पानी की অপचारित खपत को रोकना और कृषि उत्पादकता को सुनिश्चित करना है, जिसके लिए जल उपलब्धता के अनुसार किसानों को सिंचाई के लिए पानी देने की एक व्यवस्थित और निष्पक्ष प्रणाली लागू की जाएगी। यह कदम पर्वतीय इलाकों में बढ़ते जल संकट और अनियमित पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए एक आवश्यक और समयोचित पहल मानी जा रही है।

सिंचाई ढांचे की भौतिक सुरक्षा को कानूनी बचाव देने के लिए नई व्यवस्था में दंडात्मक प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। नहर, गूल या किसी भी सिंचाई से जुड़ी संरचना को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने, जैसे कि नहर की पटरी काटना, पानी का रास्ता बदलना या ढांचे को तोड़ना, अब एक गंभीर अपराध माना गया है। ऐसी गतिविधियों में शामिल पाए जाने वाले व्यक्तियों पर छह महीने तक की सजा का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा, नहरों और सिंचाई संरचनाओं के आसपास 200 मीटर की परिधि को ‘बफर ज़ोन’ घोषित करके वहां खनन और प्लास्टिक के उपयोग पर पूरी तरह से रोक लगाई गई है। इस सख्ती का मकसद नहरों के किनारों को भूस्खलन या खनन से होने वाले नुकसान से बचाना और प्लास्टिक कचरे के कारण पानी के प्रवाह में अवरुद्धता को प्रभावित होने से रोकना है, जिससे सिंचाई व्यवस्था की निरंतरता बनी रहे।

इस नीति की प्रासंगिकता तब और स्पष्ट होती है जब उत्तराखंड के सिंचाई नेटवर्क की विशालता पर नजर डाली जाए। राज्य में सिंचाई विभाग के तहत लगभग 6,600 किलोमीटर लंबी नहरें हैं, जिनके जरिए करीब 2.27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। हालांकि, पर्वतीय भू-आकृति के कारण आधुनिक नहरों के साथ-साथ पारंपरिक ‘गूलों’ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उत्तराखंड में गूलों का कुल नेटवर्क 30,217.46 किलोमीटर लंबा है, जिसमें चंपावत जिला सबसे आगे है। चंपावत में ही लगभग 1,178.51 किलोमीटर लंबा गूल नेटवर्क दर्ज है, जो जिले के ग्रामीण और पर्वतीय इलाकों की खेती की रीढ़ की हड्डी है।

चंपावत जैसे जिलों में जहां गूलों का घना जाल बिछा हुआ है, वहीं वहां के किसानों और ग्रामीणों के लिए इस नई व्यवस्था की पालना और समझना आवश्यक है। गूलों की मरम्मत, रखरखाव और पानी के सही वितरण का सीधा असर खेती के उत्पादन पर पड़ता है। नई कानूनी प्रणाली न केवल पानी के उपयोग को तय नियमों के दायरे में लाएगी, बल्कि इन प्राचीन और आधुनिक सिंचाई संरचनाओं को भी कानूनी संरक्षण देगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जल संसाधन किसी एक व्यक्ति या समूह के स्वार्थों के बजाय संपूर्ण कृषि समुदाय के हित में प्रभावी ढंग से प्रबंधित हों, जिससे उत्तराखंड की कृषि परंपरा और जल सुरक्षा दोनों को एक मजबूत आधार मिलेगा।

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।

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