हरिद्वार में 32 साल पुरानी धर्मशाला जांच फाइल गायब, ठेकेदारों और भू-माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सीधा झूठ: सूचना आयोग ने डीएम कार्यालय के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी पर लगाया 20 हजार का जुर्माना

धर्म नगरी हरिद्वार में एक गंभीर प्रशासनिक संकट सामने आया है, जहां धार्मिक संस्थाओं के भविष्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जांच फाइल के गायब होने के मामले में उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने सख्त दंडात्मक कार्रवाई की है। हरिद्वार जिलाधिकारी (डीएम) कार्यालय के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है, जिसकी वजह यह रही कि उन्होंने न तो फाइल गायब होने की पुलिस शिकायत (FIR) दर्ज कराई और न ही सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत आवेदक को आवश्यक जानकारी प्रदान की। सूचना आयोग ने इस कृत्य को न केवल अधिनियम का सीधा उल्लंघन, बल्कि संवैधानिक संस्था के स्पष्ट आदेशों की खुली अवहेलना माना है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।

यह पूरा प्रकरण सन् 1994 (फाइल संख्या 25 फरवरी 1994) से जुड़ी 32 साल पुरानी प्रशासनिक जांच पत्रावली से संबंधित है, जिसे धर्मार्थ धर्मशालाओं की संरक्षण के उद्देश्य से शुरू किया गया था। आरोपों के अनुसार, हरिद्वार की ऐतिहासिक और दान की गई धर्मशालाओं पर जिला न्यायालय की अनुमति के बिना लालची ट्रस्टियों और राजनीतिक सांठगांठ रखने वाले भू-माफियाओं द्वारा अवैध खरीद-फरोख्त की जा रही थी। इस कृत्याचार के तहत, दशकों से सेवा दे रहे प्रबंधक परिवारों को जबरन बाहर निकाला गया और धार्मिक स्थापनाओं को व्यावसायिक होटलों में बदल दिया गया। इस अवैध धंधे को रोकने के लिए अखिल भारतीय धर्मशाला प्रबंधक सभा के अध्यक्ष रमेश चंद्र शर्मा ने 19 अप्रैल 2021 को तत्कालीन कुंभ मेलाधिकारी दीपक रावत से मुलाकात कर शिकायत दर्ज कराई थी। मेलाधिकारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 21 मई 2021 को पत्र (संख्या 3443/कु.मे.) जारी करते हुए डीएम को निष्पक्ष जांच और बंद पड़ी धर्मशालाओं के सुचारू संचालन के निर्देश दिए थे।

जब रमेश चंद्र शर्मा ने जांच की स्थिति की जानकारी मांगी, तो 30 सितंबर 2021 को मुख्य प्रशासनिक अधिकारी डी.सी. धीमान ने लिखित सूचना दी कि खोजबीन के बावजूद मूल पत्रावली कार्यालय से गायब है। इसके बाद, शर्मा ने राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दाखिल की। तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त अनिल चंद्र पुनेठा ने 30 नवंबर 2022 को अंतिम आदेश जारी करते हुए निर्देश दिया कि फाइल के गायब होने पर संबंधित पुलिस थाने में तत्काल FIR दर्ज कराई जाए और आवेदक को FIR की प्रति एवं मांगी गई सूचनाएं जल्द से जल्द उपलब्ध कराई जाएं। हैरानी की बात यह रही कि प्रशासन ने आयोग के इन स्पष्ट निर्देशों को नजरअंदाज करते हुए लगातार तीन वर्षों तक न कोई FIR दर्ज कराई और न ही आवेदक को कोई जानकारी दी।

अंततः, 25 अप्रैल 2026 को रमेश चंद्र शर्मा ने धारा 18(1) के तहत शिकायती अपील दर्ज कराई। सुनवाई के दौरान, प्रशासनिक अधिकारी ने कोई संतोषजनक जवाब पेश नहीं किया। सूचना आयुक्त दिलीप सिंह कुंवर ने 8 जनवरी 2026, 18 मार्च 2026 और 1 जून 2026 समेत कुल चार बार ‘अंतिम अवसर’ दिया, लेकिन अधिकारी न तो आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए और न ही सूचनाएं मुहैया कराईं। आयोग ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अधिकारी का रवैया सूचना उपलब्ध कराने की इच्छा की पूर्ण अनुपस्थिति दर्शाता है, जो RTI अधिनियम 2005 की मूल आत्मा पर आघात है। इस घोर लापरवाही और जानबूझकर की गई अनदेखी को अक्षम्य मानते हुए, आयोग ने मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ 20,000 रुपये का दंडात्मक जुर्माना लगाने का कड़ा आदेश पारित किया है।