हरदा की राजनीति फिर से धूमधाम में: इस्तीफ़े की पेशकश, संन्यास की अफ़वाहें और नई रणनीति

उत्तराखंड की राजनीति में “हरदा” के नाम से मशहूर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत फिर से सुर्खियों में हैं। पुराने संन्यास के बयानों और हाल ही में संगठनात्मक पदों से इस्तीफ़े की पेशकश को लेकर चल रही सियासी चर्चाएँ यह सवाल उठाती हैं कि क्या सात के दशक के उत्तरार्ध में सक्रिय इस राजनीतिक योद्धा की पारी अब समाप्ति की ओर बढ़ रही है। इस बार विवाद का कारण पार्टी के भीतर की नीति नहीं, बल्कि जांच एजेंसी की कार्रवाई है, जिसने रावत को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर किया।

रावत की राजनीति का खास तरीका “दबाव की राजनीति” रहा है। जब‑जब पार्टी के भीतर या राज्य संगठन से उनकी अनबन बढ़ती, तो वे सोशल मीडिया पर एकांतवास, संन्यास या राजनीति छोड़ने के संकेत देकर दबाव बनाते और अंततः अपनी बात मनवाते रहे। इस बार ईडी की उनके पूर्व OSD चंदन सिंह जीना के परिसर में छापेमारी के बाद बरामदगी के बाद रावत ने नैतिक आधार पर कांग्रेस की स्थायी सदस्यता (CWC) और राज्य कार्यकारिणी पद से हटने की पेशकश की। हालांकि उन्होंने तुरंत स्पष्ट किया कि वे “कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता” नहीं छोड़ रहे और पार्टी उनका खून है, जिससे उनका प्रतिबद्धता का इशारा बना रहता है।

बीते दिनों जब उनकी स्वास्थ्य संबंधी खबरें आईं, तो उन्होंने बैडमिंटन कोर्ट में खेलते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। यह सोची‑समझी चाल न केवल उनके शारीरिक स्वास्थ्य को दर्शाती है, बल्कि यह संदेश देती है कि बढ़ती उम्र के बावजूद उनकी राजनीतिक ऊर्जा कम नहीं हुई। पहाड़ी राजनीति में जनता से जुड़ाव और निरंतर दृश्यता ही सबसे बड़ा हथियार है; बैडमिंटन, जलेबी बनाते हुए या स्थानीय कार्यक्रमों में भाग लेते हुए रावत की तस्वीरें उन्हें मीडिया और जनमत में जीवंत रखती हैं।

उत्तरीाखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी से जूझ रही है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में लगातार हार और रावत के अपने सीटों को न जीत पाने के कारण एक धड़ा उनके खिलाफ नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहा है। फिर भी, वह अभी भी राज्य में कांग्रेस के सबसे जाने‑पहचाने और लोकप्रिय चेहरे में से एक हैं। सीबीआई, ईडी और भ्रष्टाचार के आरोपों से उनकी छवि पर धक्का लगा है, पर वह इन क्षणों को “विक्टिम” का कार्ड खेलकर जनसमर्थन हासिल करने में माहिर हैं। युवा नेताओं की चुनौती के बावजूद, रावत की राजनीति को समाप्त मानना जल्दबाजी होगी; जब तक कांग्रेस में उनका कोई सर्वमान्य विकल्प तैयार नहीं होता, तब तक वह उत्तराखंड की राजनीति में अप्रासंगिक नहीं हो सकते। यह इस्तीफ़ा उनका अंत नहीं, बल्कि अपनी सियासी पिच को बचाने की एक और पैंतरेबाज़ी है।

Original Title: क्या हरदा की सियासी पारी अब खात्मे की ओर ? संन्यास के पुराने बयानों ने फिर पकड़ा जोर

Original Content: उत्तराखंड की राजनीति में “हरदा” के नाम से मशहूर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में हैं। संन्यास के पुराने बयानों और हाल में संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश को लेकर चल रही सियासी चर्चाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में चल रहे इस सियासी योद्धा की पारी अब खात्मे की ओर है?

संन्यास की पुरानी अफवाहें और इस्तीफे का नया मोड़

हरीश रावत की राजनीति का एक खास तरीका रहा है-दबाव की राजनीति। पूर्व में भी जब-जब पार्टी आलाकमान या राज्य संगठन से उनकी अनबन हुई, उन्होंने सोशल मीडिया पर एकांतवास, संन्यास या राजनीति छोड़ने के संकेत देकर दबाव बनाया और अंततः अपनी बात मनवाई। इस बार विवाद का कारण राजनीतिक नहीं, बल्कि जांच एजेंसी की कार्रवाई है। उनके पूर्व OSD चंदन सिंह जीना के परिसरों पर ईडी  की छापेमारी में बरामदगी के बाद रावत ने नैतिक आधार पर सीडब्ल्यूसी की स्थायी सदस्यता और राज्य कार्यकारिणी पद से हटने की पेशकश की। हालांकि, उन्होंने तुरंत यह भी स्पष्ट किया कि वे “कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता” नहीं छोड़ रहे हैं और पार्टी उनके खून में है।  

बीते दिनों जब उनकी सेहत ठीक न होने की बात सामने आई तो उन्होंने सोशल मीडिया पर बैडमिंटन खेलते हुए वीडियो पोस्ट कर एक सोची-समझी रणनीति के तहत संदेश दिया कि सियासत में अभी तो मैं जवान हूं। यानी वे अपने विरोधियों और पार्टी के भीतर प्रतिद्वंद्वियों को यह संदेश देना चाहते हैं कि बढ़ती उम्र के बावजूद उनकी शारीरिक और राजनीतिक सक्रियता कम नहीं हुई है। रावत जानते हैं कि पहाड़ी राजनीति में जनता से जुड़ाव और निरंतर दृश्यता (विजिबिलिटी) ही सबसे बड़ा हथियार है। बैडमिंटन कोर्ट से लेकर जलेबी बनाने तक की उनकी तस्वीरें उन्हें मीडिया और जनता की चर्चा में बनाए रखती हैं।

कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और रावत की घेराबंदी

उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी से जूझ रही है। रावत के खिलाफ पार्टी का एक धड़ा लगातार इस बात की वकालत कर रहा है कि अब नेतृत्व परिवर्तन होना चाहिए। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में मिली हार और खुद रावत के अपनी सीटें न जीत पाने के कारण, विरोधी गुट को उनकी घेराबंदी का मौका मिला।

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सियासी पिच को बचाने की एक और पैंतरेबाजी

क्या हरीश रावत की राजनीति खत्म हो जाएगी? यह एक बड़ा सवाल रहा है 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में व्यक्तिगत हार से उनके जनाधार पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन पूरे उत्तराखंड में आज भी वह कांग्रेस का सबसे जाना-पहचाना और लोकप्रिय चेहरा हैं। कहा जाता है कि उन पर सीबीआई और पूर्व सहयोगियों पर ईडी और भ्रष्टाचार के आरोपों से छवि को धक्का लगा है लेकिन वह ऐसे आड़े वक्त में दबाव के क्षणों में खुद को ‘विक्टिम’ की तरह पेश कर सहानुभूति कार्ड खेल जाते हैं इस तरह जनसमर्थन हासिल करने की कला में पारंगत हैं। पार्टी के भीतर युवा पीढ़ी यानी नए नेता रावत के प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश करते रहे हैं किंतु हरदा का राजनीतिक चातुर्य यह है कि उन्हें अंतिम समय में बाजी पलटने और आलाकमान को साधने में महारत हासिल है।

ऐसे में देखें तो हरीश रावत की राजनीति को इतनी आसानी से समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी। भले ही वे कानूनी, उम्र से जुड़े और पार्टी के अंदरूनी मोर्चों पर चौतरफा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं,