देहरादून: प्रेमनगर थाने में गर्भवती महिला के साथ टॉर्चर का शक, कोर्ट ने 5 पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश

देहरादून के प्रेमनगर थाने से जुड़े एक गंभीर और विवादास्पद मामले में न्यायालय ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए 5 पुलिसकर्मियों, जिनमें तत्कालीन थाना प्रभारी नरेश राठौर भी शामिल हैं, के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है। यह निर्देश एक युगल, प्रवीण सेमवाल और प्रतीक्षा सेमवाल, द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद आया है, जिसमें पुलिसकर्मी द्वारा जबरन हिरासत, बेरहम मारपीट और टॉर्चर का आरोप लगाया गया है। न्यायालय ने इन आरोपों की गंभीरता को समझते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए उच्च स्तरीय अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी है, जिससे यह मामला शहर में एक बड़ी कानूनी और सामाजिक चर्चा का विषय बन गया है।

पीड़ित पक्ष के वकील संजीव कुमार के अनुसार, 9 अप्रैल 2026 को दोपहर के समय पुलिसकर्मी एक निजी वाहन के जरिए प्रवीण और उनकी पत्नी प्रतीक्षा के पास पहुंचे और उन्हें जबरन गाड़ी में बैठाकर प्रेमनगर थाने ले गए। शिकायत में दावा किया गया है कि रास्ते में ही पुलिसकर्मियों ने उन्हें ‘एनकाउंटर’ करने की धमकी दी थी। थाने पहुंचने के बाद प्रवीण के साथ मारपीट शुरू कर दी गई, जबकि प्रतीक्षा ने बीच-बचाव करने का प्रयास किया। चूंकि प्रतीक्षा उस समय गर्भवती थीं, इसलिए मारपीट के दौरान उन्हें गंभीर चोटें लगीं और ब्लीडिंग शुरू हो गई, जिसके सबूत के तौर पर मेडिकल दस्तावेज अदालत के सामने पेश किए गए हैं। पीड़ितों ने यह भी आरोप लगाया कि थाने में उन्हें दबाव डालकर यशपाल तंवर नाम के व्यक्ति को 20 लाख रुपये देने के लिए लिखित समझौता नोटरी करवाया गया। 9 अप्रैल से 10 अप्रैल तक की हिरासत के दौरान, जब भी प्रवीण ने अपने चार वर्षीय बेटे की देखभाल के लिए घर जाने की गुहार लगाई, पुलिस ने अनसुनी कर दी और उन्हें लॉक-अप में रख दिया।

पुलिस प्रशासन ने न्यायालय में पेश रिपोर्ट में इन सभी आरोपों को निराधार और गलत बताया है। पुलिस का कहना है कि प्रतीक्षा सेमवाल ने थाने में महिला उपनिरीक्षक के साथ अभद्र व्यवहार किया, मारपीट की और उनकी वर्दी फाड़ दी, जिससे सरकारी कार्य में बाधा पहुंची। पुलिस ने अपने दावों की पुष्टि के लिए थाने की सीसीटीवी फुटेज का हवाला दिया, जिसमें प्रतीक्षा का शोर-शराबा करते हुए होना दिखाया गया। वहीं, प्रवीण और प्रतीक्षा के खिलाफ चोरी और धोखाधड़ी के आरोपों में अलग से मुकदमा दर्ज किया गया था। हालांकि, प्रवीण ने दावा किया कि पुलिस ने उनके साथ जबरन अभद्रता की और उन्हें अपनी वर्दी फाड़ने के लिए प्रवर्तित किया, जो कि एक मनगढ़ंत मामला था।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पीड़ित पक्ष द्वारा पेश की गई मेडिकल रिपोर्ट, दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की बारीकी से जांच की। अदालत ने यह नोट किया कि पुलिस अधिकारियों को शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई नहीं करने पर न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी। न्यायालय ने तथ्यों की प्रकृति को देखते हुए यह निर्णय लिया कि आरोपों के पीछे की सच्चाई का पता लगाने के लिए एक प्रभावी जांच आवश्यक है। चूंकि आरोपों में शामिल पुलिस अधिकारियों में इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी शामिल हैं, इसलिए कोर्ट ने जांच को उससे ऊपर के स्तर के अधिकारियों को सौंपने का निर्देश दिया है। नतीजतन, नरेश राठौर (जो अब पटेल नगर में तैनात हैं) और चार अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया गया है।

पीड़ित प्रवीण सेमवाल ने इस आदेश पर न्याय व्यवस्था पर भरोसा जताते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि न्याय मिलेगा, हालांकि उन्होंने पुलिस की स्वयं की जांच पर विश्वास का अभाव जताते हुए CBCID (Civil Police and Criminal Investigation Department) द्वारा जांच कराने की मांग की है। वकील संजीव कुमार ने भी इसी कगार पर खड़े होकर कहा कि वे जांच को CBCID को ट्रांसफर कराने की कोशिश करेंगे ताकि जांच निष्पक्ष बने। यह केस अब उत्तराखंड में पुलिस-जनता संबंधों और कानूनी प्रक्रियाओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रहा है, जहां न्यायिक दखल के बिना पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पा रहा था, यह तथ्य विवाद को और गहरा करता है।