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20 अगस्त को 107वीं जयंती पर दिनेश ध्यानी का विशेष आलेख

जन्म – 20 अगस्त 1919
निधन – 14 सितम्बर 1947
प्रकृति के चितेरे कवि, हिमवंत पुत्र चन्द्र कुंवर बर्त्वाल का जन्म उत्तराखण्ड के चमोली जिले के ग्राम मालकोटी, पट्टी तल्ला नागपुर में 20 अगस्त 1919 में हुआ था। बर्त्वाल जी की शिक्षा पौड़ी, देहरादून और इलाहाबाद में हुई तथा 1939 में इन्होने इलाहाबाद से बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा 1941 में एम०ए० में लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। यहीं पर ये श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी के सम्पर्क में आये।
इस छोटी सी उम्र में भी वह देश-दुनिया को सुंदर साहित्य दे गए. चंद्र कुंवर बर्त्वाल की कविताएं मानवता को समर्पित थीं. बेशक वह प्रकृति के कवि पहले थे. बर्त्वाल हिंदी साहित्य के एक मात्र ऐसे कवि थे जिन्होंने हिमालय, प्रकृति व पर्यावरण के साथ-साथ मनुष्य की सुंदर भावनाओं और संवेदनाओं को अपनी कविताओं में पिरोया. उनकी कविताएं हिमालय व प्रकृति प्रेम की साक्षी रही हैं। अल्पायु में ही उन्होंने हिंदी में एक हजार अनमोल कविताएं, 24 कहानियां, एकांकी और बाल साहित्य का अनमोल खजाना हिंदी साहित्य को दिया. मृत्यु पर आत्मीय ढंग और विस्तार से लिखने वाले चंद्र कुंवर बर्त्वाल हिंदी के पहले कवि हैं.
1939 में ही इनकी कवितायें “कर्मभूमि” साप्ताहिक पत्र में प्रकाशित होने लगी थी, इनके कुछ फुटकर निबन्धों का संग्रह “नागिनी” इनके सहपाठी श्री शम्भूप्रसाद बहुगुणा जी ने प्रकाशित कराया। बहुगुणा जी ने ही 1945 में “हिमवन्त का एक कवि” नाम से इनकी काव्य प्रतिभा पर एक पुस्तक भी प्रकाशित की। इनके काफल पाको गीति काव्य को हिन्दी के श्रेष्ठ गीति के रूप में “प्रेमी अभिनन्दन ग्रन्थ” में स्थान दिया गया। इनकी मृत्यु के बाद बहुगुणा जी के सम्पादकत्व में “नंदिनी” गीति कविता प्रकाशित हुई, इसके बाद इनके गीत- माधवी, प्रणयिनी, पयस्विनि, जीतू, कंकड-पत्थर आदि नाम से प्रकाशित हुये। नंदिनी गीत कविता के संबंध में आचार्य भारतीय और भावनगर के श्री हरिशंकर मूलानी लिखते हैं कि “रस, भाव, चमत्कृति, अन्तर्द्वन्द की अभिव्यंजना, भाव शवलता, व्यवहारिकता आदि दृष्टियों से नंदिनी अत्युत्तम है। इसका हर चरण सुन्दर, शीतल, सरल, शान्त और दर्द से भरा हुआ है।
चंद्र कुंवर कालिदास को मानते थे। उनका कहना था कि-
‘मैं न चाहता युग-युग तक पृथ्वी पर जीना,
पर उतना जी लूं जितना जीना सुंदर हो.
मैं न चाहता जीवन भर मधुरस ही पीना,
पर उतना पी लूं जिससे मधुमय अंतर हो।
ये पंक्तियां हैं हिंदी के कालिदास के रूप में जाने माने प्रकृति के चितेरे कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की। बहुत कम लोगों को पता होगा कि जीवन में असाध्य रोग से पीड़ित रहने के बाद भी उन्होंने साहित्य सेवा का साथ-साथ चमोली के पोखरी और रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि में अध्यापन भी किया था। आज उनके साहित्य पर कई छात्र पीएचडी कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि उत्तराखण्ड के सुदूर गांव का या राष्ट्रीय कवि आज भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान से महरूम है।
चंद्र कुंवर बर्त्वाल की प्रमुख कविता संग्रह और रचनाओं में प्रमुख हैं गीत संग्रह: गीत माधवी, पयस्विनी, प्रेमिनी, जीतू, कंकड़-पत्थर, और नंदिनी।
प्रमुख कविताएं: पयस्विनी, पाँवलिया, अल्लाह की जुबान, मुझको पहाड़ ही प्यारे हैं, घर की याद, बसंत आगमन, और स्वर्ग सरि। इसके अलावा बहुत सा साहित्य उनकी मृत्यु के बाद उनके सामान के साथ ही जला दिया गया था। क्योंकि टीबी की बीमारी का भय इतना था कि मरीज के कपड़ों, बर्तनों आदि किसी भी सामान को नहीं छू ते थे। लोग डरते थे कि कहीं यह बीमारी हमें न हो जाये इसलिए चंद्र कुंवर बर्त्वाल के देहांत के बाद उनका अधिकांश सामान जला दिए गया। जिसमे उनका रचना संसार का एक अहम् हिस्सा स्वाहा हो गया। फिर भी उनके जाने के बाद बहुत कुछ साहित्य दुनियां के सामने आ पाया। चंद्र कुंवर बर्त्वाल की मृत्यु के बाद उनके सहपाठी शंभुप्रसाद बहुगुणा ने उनकी रचनाओं को प्रकाशित करवाया और यह दुनिया के सामने आईं. इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि आज भी हिंदी साहित्य के अनमोल रत्न कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल को राष्ट्रीय स्तर पर वो सम्मान प्राप्त नहीं हो सका है, जिसके वह हकदार थे। उन्हें हिंदी साहित्य का ‘कालिदास’ भी कहा गया।
चंद्र कुंवर बर्त्वाल की प्रमुख कविताओं में विराट ज्योति, कंकड़-पत्थर, पयस्विनी, काफल पाकू, जीतू, मेघ नंदिनी हैं। चंद्र कुंवर बर्तवाल जब क्षय रोग (TB) से ग्रसित हुए, तो उनका नैनीताल जिले के भवाली स्थित टीबी सेनिटोरियम में इलाज करवाया गया। परिजनों द्वारा उनके लिए अगस्तमुनि के पास पवालिया में घर बनाया गया. चंद्र कुंवर अकेले ही वहां रहने लगे, क्योंकि उस दौर में छय रोग को छुआछूत की बीमारी माना जाता था, इसलिए सभी उनसे दूर रहने लगे. बीच-बीच में उनके परिजन उनको देखने के लिए आया करते थे. बर्तवाल ज्यादा वक्त नदी, पहाड़ और प्रकृति के बीच ही रहते थे, जिसके चलते उनकी अनगिनत रचनाएं पहाड़ प्रकृति की हैं. घर के लोग सुबह-शाम को उनके लिए दरवाजे पर भोजन रख आते थे और बाकी दिन-रात चंद्र कुंवर एकांत में अपनी मौत को धीरे-धीरे उनके करीब आता महसूस करते थे। मृत्यु शय्या पर पड़े हुए के युवा जिसे पता है आज नहीं तो कल उसे मारना ही है। इस दशा में उन्होंने अपने को टूटने नहीं दिया। वे दुरूह बीमारी में भी खाट पर पड़े-पड़े और बैठे-बैठे खिड़की से सुदूर प्रकृति के नजारों को निहारते रहते और मौत सहित प्रकृति पर कवितायेँ रचते रहते। उनकी तन्हाई और कागज कलम ही उनका साथी थे।वह तिल-तिल कर मर रहा था लेकिन फिर भी कुछ रच रहा था, कुछ लिख रहा था। आखिरकार टीबी की बीमारी से जंग लड़ते हुए 1947 में मात्र 28 साल की उम्र में हिमालय के पुत्र ने हिमालय की गोद में ही दम तोड़ दिया।
उत्तराखण्ड के सुपरिचित इतिहासकार कैप्टेन शूरवीर सिंह पँवार का मत है कि महाकवि सुमित्रानन्दन पन्त और महाप्राण निराला से भी चन्द्र कुवर बर्त्वाल की घनिष्ठता थी। ’उत्तराखण्ड भारती’ त्रैमासिक जनवरी से मार्च 1973 के पृष्ठ 67 पर यह अंकित है कि निराला जी के साथ 1939 से 1942 तक उन्होंने अपना संघर्षमय जीवन उनके पास रहकर बिताया था। उन्होंने 25 से अधिक गद्य रचनायें भी लिखीं हैं जिससे कहानी ,एकांकी, निबन्ध एवं आलोचनायें भी हैं परन्तु उनके लिखे पद्य के अपार संग्रह से यह सिद्ध होता है कि वे मूलतः कवि थे। बर्त्वाल की अब तक अन्वेषित लगभग आठ सौ से अधिक गीत और कवितायें यह सिद्ध करती हैं कि प्रकृति के चितेरे चन्द्रकुंवर बर्त्वाल हिन्दी के मंजे हुये कवि थे।
चंद्र कुंवर बर्त्वाल की मृत्यु के बाद उनकी काफी रचनाओं को उनके मित्र शम्भू प्रसाद बहुगुणा और बुद्धि बल्लभ थपिलयाल ने संरक्षित कर लिया और उन्हें प्रकाशित किया। शंभूप्रसाद बहुगुणा ने उनकी लगभग 350 कविताओं का संग्रह संपादित किया । जिसके बाद चंद्र कुंवर बर्त्वाल को हिंदी साहित्य जगत में प्रसिद्धि मिली. जब उन्हें क्षय रोग था, उस दौरान निराला का उनसे पत्राचार होता रहता था।
कुछ लोगों का कहना है कि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की कविताओं के अलावा भी उनके द्वारा लिखा साहित्य जिसमें एकाकी, यात्रा साहित्य, डायरी लेखन ये सब भी कहीं न कहीं हो सकती हैं अगर यह सब सामने आता है तो हिंदी साहित्य जगत को बहुत कुछ मिल सकता है। मृत्यु के सामने खड़े कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल मात्र 28 साल की जीवन यात्रा में हिन्दी साहित्य की अपूर्व सेवा कर 14 सितंबर, 1947 को अनन्त यात्रा पर प्रस्थान कर गये। वह रविवार का दिन था जब चंद्र कुंवर अपने पीछे अपनी अव्यवस्थित काव्य संपदा को छोड़ गए तथा जब उनको लगा कि अब मृत्यु नजदीक ही है तो उन्होंने अपनी कलम से इन शब्दों के माध्यम से अपने भाव प्रकट करे :-
मैं सभी के करूण-स्वर हूॅ सुन चुका
हाय मेरी वेदना को पर न कोई गा सका।
मकडी काली मौत है, रोग उसी के जाल,
मक्खी से जिसमें फँसे ,चन्द्र कुँवर बर्त्वाल।
खडी हो रही हड्डियाँ, सूख रही है खाल।
और
विदा-विदा हे हरित तृणों की सुन्दर धरती ।
विदा-विदा हे मानव पशु की पूजित जननी
विदा हृदय के सुख चिर विदा प्राण-प्रिय यौवन ।
चन्द्रकुंवर बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। हिन्दी साहिन्य के भण्डार की समृद्वि और हिन्दी काव्य जगत में उनका योगदान विशेष उल्लेखनीय है। हिमालय का सौंदर्य और उसके विविध चित्र उनके काव्य में यत्र तत्र अनायास ही बिखरे मिल जाते है। वे मूलतः कवि थे। इसलिये गीत और कवितायेँ उन्होने मुख्य रूप से लिखी हैं। अव तक उपलब्ध और अन्वेषित रचनाओं के आधार पर कह जा सकता है कि उन्होने लगभग आठ सैा से अधिक गीत ओर कवितायें लिखी । इसके अतिरिक्त करीब 25 से अधिक गद्य रचनायें की , जिनमें कहानी, एकांकी, निबन्ध एवं आलोचनाऐं प्रमुख हैं।
इस प्रकार जीवन में असाध्य पीड़ा को आत्मसात करने के बाद इस संसार से विदा होने वाला यह युवा चिंतक, कवि, लेखक हिंदी साहित्य संसार को जीवन के अल्प कालखंड में इतना अद्भुत साहित्य प्रदान तो कर गया लेकिन क्या कारण है कि आज तक भी इस विराट कवि लो राष्टीय स्तर पर जो उचित सम्मान मिलना चाहिए था वह क्यों नहीं मिला? इस पर चिंतन अवश्य होना चाहिए।
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