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हिमालय की सख्तियों पर विजय: वसुंधरा ताल में स्थापित देश का पहला आधुनिक ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ बनेगा लाखों की रक्षक

कल्पना कीजिए, समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर, जहां तापमान शून्य से नीचे जम जाता है, तेज बर्फीली हवाएं चलती हैं और ऑक्सीजन की कमी से सांस लेना कठिन हो जाता है। ऐसे कठिन माहौल में, जहां इंसान के लिए कुछ ही घंटे टिकना मुश्किल होता है, भारतीय वैज्ञानिकों की एक टुकड़ी ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित प्रसिद्ध वसुंधरा ग्लेशियल ताल में देश की सबसे आधुनिक ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ (अभी चेतावनी प्रणाली) का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। यह प्रणाली आने वाले समय में उत्तराखंड के लाखों लोगों की जान बचाने का दायित्व संभालेगी, जो हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित होगी।

इस जोखिम भरे मिशन के सफल समापन के बाद, मंगलवार को वैज्ञानिकों और सुरक्षा बलों की टीम देहरादून लौटी, जहाँ ‘उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ (USDMA) के आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने दल का स्वागत किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस ऐतिहासिक सफलता पर गहरी प्रसन्नता व्यक्त की, तब उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक शोध के माध्यम से राज्य, प्राकृतिक आपदाओं के खतरे की पहचान करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अपना प्राथमिकता बनाए हुए है। इसी कड़ी में, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने भी वैज्ञानिकों और जवानों की सराहना करते हुए कहा कि अब मौसम, बर्फबारी और झील के जलस्तर से जुड़े सटीक आंकड़े मिलेंगे, जिससे समय रहते सुरक्षा उपाय किए जा सकेंगे।

वसुंधरा ताल, जो लगभग 38.50 मीटर गहरी, 600 मीटर चौड़ी और 900 मीटर लंबी है, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ाने वाली जगहों में से एक मानी जाती है। केदारनाथ और चमोली की पिछली घटनाओं के संदर्भ में, यह सिस्टम अत्यंत आवश्यक है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की के वरिष्ठ वैज्ञानिक और मिशन के नेतृत्वकर्ता डॉ. डीपी कानूनगो ने बताया कि पुराने आंकड़ों के मिलान पर फिलहाल झील के आकार या जलस्तर में कोई असामान्य बदलाव नहीं मिला है, लेकिन निगरानी का यह सिस्टम भविष्य के खतरों से बचाव के लिए ज़रूरी है। इस मिशन में CBRI, WIHG के वैज्ञानिकों के साथ-साथ SDRF, NDRF और ITBP के जवानों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

तकनीकी दृष्टि से, इस प्रणाली में ऑल-इन-वन मौसम सेंसर, जलस्तर मापने वाले फ्लोटिंग और सबमर्ज्ड सेंसर, भू-कंपन के लिए एक्सेलेरोमीटर, हिमस्खलन सेंसर और तापमान/बर्फ की मोटाई मापने वाले 8 सेंसर लगाए गए हैं। सबसे बड़ी चुनौती कम्युनिकेशन थी, क्योंकि वहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। इसके लिए ‘इरिडियम सैटेलाइट कम्युनिकेशन’ तकनीक का उपयोग किया गया है, जो सामान्य दिनों में हर 2 घंटे में डेटा भेजती है, जबकि आपदा की स्थिति में ‘रियल-टाइम’ अलर्ट देती है। यह सिस्टम सोलर पैनल और 280 एम्पीयर की बैटरी पर चलता है, जो 10 दिन तक बिना धूप के भी कार्य करता है।

इस सफलता का अब राज्य की अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर भी विस्तार किया जाएगा, जो उत्तराखंड के लिए एक ‘कवच’ के रूप में काम आएगी। डॉ. डी.पी. कानूनगो, डॉ. एस.के. पाणीग्रही, डॉ. कौशिक पंडित और अन्य विशेषज्ञों के सहयोग से यह प्रणाली अब पूरी तरह संचालित है। अब जब भी वसुंधरा ताल में मौसम बिगड़ेगा या जलस्तर खतरे में बढ़ेगा, तो नीचे घाटियों में बसे गांवों तक खतरा पहुंचने से पहले ही चेतावनी का अलार्म बज जाएगा, जिससे बचाव कार्य समय रहते किए जा सकेंगे।

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।