उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी देहरादून के प्रशासनिक और आर्थिक केंद्र राजपुर रोड (अ.जा.) विधानसभा सीट पर आगामी चुनाव के लिए सियासी तूफान खड़ा हो रहा है। यह सीट न केवल शहर का दिल बल्कि एक ऐसा क्षेत्र भी है जहाँ पॉश कॉलोनियों की आड़ में रिस्पना नदी किनारे बसी मलिन बस्तियों का बड़ा वोट बैंक छुपा है। राजनीतिक समीकरण अब दो प्रमुख चेहरों के इर्द-गिर्द घूम रहा है—भाजपा के मौजूदा कैबिनेट मंत्री खजान दास और कांग्रेस के पूर्व विधायक राजकुमार। 2022 के विधानसभा चुनाव में खजान दास ने 11,163 वोट के अंतर से जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार चुनावी गणित में एक बड़ा बदलाव आया है। इस सीट से 15,364 वोटरों के नाम कट गए हैं, जो पिछली बार की जीत-हार के अंतर से काफी ज्यादा है। यह आंकड़ा न केवल मौजूदा सियासी ताने-बाने को उलट-पलट कर देने की क्षमता रखता है, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि आगामी चुनाव में वोटों की गिनती की बजाय वोटों का नया मिलान होना अनिवार्य है।
मंत्री पद की जिम्मेदारियों और चुनौतियों के बीच खजान दास के सामने अब सिर्फ जीत की नहीं, बल्कि विश्वास जीतने की परीक्षा है। धामी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में समाज कल्याण जैसे जनकल्याणकारी विभागों की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद, जनता की अपेक्षाओं की मंझिलें ऊपर उठ गई हैं। हालाँकि, पार्टी संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत है और शहरी इलाकों में भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक उनके साथ खड़ा है, लेकिन सड़कों का चौड़ीकरण, यातायात व्यवस्था और बस्तियों से जुड़े वादों को पूरा करना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा है। विवादों ने भी इस राह में रुकावटें खड़ी की हैं; कुछ दिनों पहले भाजपा के ही कुछ लोगों द्वारा एससीएसपी व एसटीएसपी योजनाओं के आवंटन में अनियमितताओं के आरोपों ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया है। आगे चलकर, पार्टी के स्थानीय पार्षदों और एससी मोर्चा के पदाधिकारियों से टिकट बंटवारे के समय चुनौती भी सामने आ सकती है।
दूसरी ओर, कांग्रेस के पूर्व विधायक राजकुमार के लिए यह चुनाव ‘वापसी’ की कहानी है। 2012 में जीत के बाद से ही राजपुर रोड की राजनीति में सक्रिय राजकुमार की सबसे बड़ी ताकत उनका जमीनी स्तर पर जनता से सीधा संवाद है। वे मलिन बस्तियों और श्रमिक वर्गों के बीच अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं और पेयजल संकट, ट्रैफिक जाम जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरते रहते हैं। हालांकि, 2017 और 2022 में मिली लगातार हारों के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। कांग्रेस संगठन का पूरा ध्यान इन स्थानीय असंतोषों को बड़े मुद्दे में बदलने पर है, लेकिन युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के नए दलित चेहरों के उभरना तथा गुटबाजी इस समीकरण को और जटिल बना रही है।
राजपुर रोड का चुनावी समीकरण बहु-स्तरीय है। अनुसूचित जाति (SC) आरक्षित सीट होने के कारण वाल्मीकि, जाटव और शिल्पकार समाज का वोट निर्णायक भूमिका निभाता है, जबकि पंजाबी, गढ़वाली और गोरखा समुदाय मतदान के प्रतिशत को तय करते हैं। रिस्पना किनारे की बस्तियाँ जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का किला रही हैं, वहाँ भाजपा ने कल्याणकारी योजनाओं के जरिए सेंध लगाई है। इस बीच, बसपा का प्रभाव घटकर एक प्रतिशत से भी कम रह गया है, जबकि आम आदमी पार्टी (आप) ने 2022 में 4,127 वोट हासिल करके अपनी पहचान बनाई है। अब यह देखने वाली बात होगी कि 2022 के बाद बदले हुए वोटों के नक्शे में खजान दास अपनी ‘हैट्रिक’ लगा पाते हैं या राजकुमार एक बार फिर राजपुर रोड के ‘राजकुमार’ बनकर वापसी करते हैं।
