📅 Tuesday, 03 November 2026 ⛅ 24°C नैनीताल / देहरादून 📈 SENSEX +420.5 (82,140)
Ad Space (728x90) - Appearance > Customize > Ad Placements
⚡ ब्रेकिंग न्यूज़
🔴 ड्रामेबाज से राजनीति: दीप्ति रावत ने सोनिया आनंद को दिया कानून के सामने पेश होने का चैलेंज 🔴 दिल्ली‑देहरादून वोल्वो सेवाओं में बदलाव: 1 नवम्बर से 200 उत्तराखंड बसें बंद, नई रूट्स पर विस्तार की तैयारी 🔴 कांग्रेस की दिल्ली बैठक में उठी उत्तराखंड की चुनावी रणनीति, 4 नवंबर को न्याय यात्रा का संकल्प 🔴 दलेर मेहंदी विवाद में सबोध उनियाल का अडिग रुख: “इस्तीफा दूंगा, पर माफी नहीं” 🔴 हारिक सिंह रावत के परिवार में खुला विवाद — पत्नी दीप्ति ने दी कानूनी चेतावनी, सोनिया आनंद पर लगाया धोखाधड़ी का आरोप 🔴 जालसाज़ी का पर्दाफाश: फर्जी 8वीं टीसी से बनी आशा कार्यकर्ता, फिर जीती ग्राम प्रधान का चुनाव; कोर्ट के आदेश पर पति-पत्नी के खिलाफ FIR
होम » खबरनामा » टिहरी के ऊंचौन गांव में जलसंकट का समाधान: IIT रुड़की की वैज्ञानिक खोज ने दो गुना पानी बहाया

टिहरी के ऊंचौन गांव में जलसंकट का समाधान: IIT रुड़की की वैज्ञानिक खोज ने दो गुना पानी बहाया

उत्तराखंड के टिहरी जिले के ऊंचौन गांव में अब जल की कमी को लेकर डर नहीं रहा। जहाँ गर्मियों में हिमालयी जलस्रोत सूख कर बिखरते थे और महिलाएँ एक बाल्टी पानी के लिए घंटों की यात्रा करती थीं, वहीं अब गांव के नलों से रोज़ाना 500 लीटर से बढ़कर 1,000 लीटर से अधिक साफ पानी बह रहा है। यह परिवर्तन जादू नहीं, बल्कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग की टीम की वैज्ञानिक सोच, कड़ी मेहनत और सटीक भू‑वैज्ञानिक अध्ययन का नतीजा है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (नमामि गंगे) के तहत जल शक्ति मंत्रालय द्वारा शुरू की गई “टिहरी जिले के तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में सूखते जलस्रोतों का पुनर्जीवन” परियोजना को IIT रुड़की ने संभाला, और प्रोफेसर अभयानंद सिंह मौर्य को प्रमुख अन्वेषक नियुक्त किया गया। टीम ने लगभग 143 वर्ग किलोमीटर में फैले तकोली गाड क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण किया, यह जानने के लिए कि पहाड़ों की पिघली हुई भू‑परतों में पानी कहाँ जमा होता है और कैसे बहता है।

विज्ञान के दो प्रमुख अध्ययनों ने इस खोज को सुदृढ़ किया। “हाइड्रोलॉजिकल साइंसेज जर्नल” में प्रकाशित पहले शोध में स्थिर एवं रेडियो‑समस्थानिक और ट्रिटियम मापन से यह पता चला कि पहाड़ों के भू‑जल का 82 % योगदान मानसूनी वर्षा से आता है, जबकि शीतकालीन और मानसून‑पूर्व बारिश का योगदान क्रमशः 10 % और 8 % है। “एप्लाइड जियोकेमिस्ट्री” में प्रकाशित दूसरे अध्ययन ने दिखाया कि चूना पत्थर (कार्बोनेट शैल) का अपक्षय और मानसून‑रीचार्ज जल की रासायनिक गुणधर्म निर्धारित करते हैं। इन परिणामों को आधार बनाकर भू‑भौतिकीय जांच के माध्यम से ऊंचौन गांव के ऊपरी ढलान पर कई विशेष खाइयाँ खोदी गईं, जिससे वर्षा के पानी की गति धीमी हुई, जल का भू‑जल में रिचार्ज बढ़ा और अंततः चंद्रबदनी मंदिर मार्ग के किनारे एक नया जलस्रोत उभरा।

ऊंचौन गांव के निवासियों, विशेषकर महिलाओं को अब पीने‑पेय के लिए दो गुना पानी मिलने से बड़ी राहत मिली है। प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य ने कहा, “हिमालयी क्षेत्रों में जल संकट को दूर करने के लिए जल स्रोत, प्रवाह और मौसमी बदलाव को गहराई से समझना आवश्यक है; हमारे शोध ने मानसूनी रीचार्ज और भू‑वैज्ञानिक परिस्थितियों की अहम भूमिका सिद्ध की।” IIT रुड़की के निदेशक प्रो. के.के. पंत ने इस सफलता को वैज्ञानिक शोध के सामाजिक लाभ का उदाहरण बताया, “जब विज्ञान स्थानीय जरूरतों से जुड़ता है, तो जल सुरक्षा की नई मिसाल बनती है।”

यह मॉडल केवल ऊंचौन गांव की जीत नहीं, बल्कि उत्तराखंड और पूरे हिमालयी क्षेत्र के हजारों सूखे गांवों के लिए एक ब्लूप्रिंट बन गया है। यदि इसी प्रकार की भू‑वैज्ञानिक जांच और स्थानीय भागीदारी को अन्य जलस्रोतों पर लागू किया जाए, तो पहाड़ों से जल प्रवाह को स्थायी रूप से सुरक्षित किया जा सकता है और जल संकट का स्थायी समाधान संभव हो सकता है।

Original Title: पहाड़ी गांवों के लिए उम्मीदः टिहरी के गांव में आईआईटी रुड़की ने सूखे के दिनों में भी दोगुना कर दिया पानी

Original Content: पहाड़ों में जीवन जितना खूबसूरत है, पानी की किल्लत इसे उतना ही कठिन बना देती है। गर्मियों के आते ही हिमालयी क्षेत्रों के प्राकृतिक नौले, धारे और गधेरे (जलस्रोत) सूखने लगते हैं। दूर-दराज के गांवों में महिलाओं और बुजुर्गों को एक-एक बाल्टी पानी के लिए घंटों भटकना पड़ता है। लेकिन उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल स्थित ऊंचौन गांव में इस बार तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। जिस गांव में सूखे के दिनों में पानी की बूंद-बूंद को तरसना पड़ता था, वहां अब नल-धारों से दोगुना पानी बह रहा है।

यह चमत्कार किसी जादू से नहीं, बल्कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के वैज्ञानिकों की सोच, मेहनत और सटीक भू-वैज्ञानिक खोज का नतीजा है। आईआईटी रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग की टीम ने अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के बल पर गांव में एक नया और टिकाऊ जलस्रोत विकसित कर दिया है। इसका असर यह हुआ कि सूखे और कम पानी वाले मौसम में भी गांव में रोजाना मिलने वाला पानी 500 लीटर से सीधा बढ़कर 1000 लीटर या उससे भी अधिक हो गया है।

क्या थी असली समस्या और कैसे शुरू हुई तलाश?

हिमालयी क्षेत्र में करीब 50 फीसदी प्राकृतिक जलस्रोत या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या फिर गर्मियों में उनका पानी बहुत कम रह जाता है। दूर-दराज की बस्तियों में जब पानी का कोई और जरिया नहीं होता, तो ग्रामीणों के सामने भारी संकट खड़ा हो जाता है। इसी समस्या के पक्के समाधान के लिए भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के ‘राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन’ (नमामि गंगे) के तहत एक विशेष परियोजना शुरू की गई—“टिहरी जिले के तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में सूखते जलस्रोतों का पुनर्जीवन”。 इस पूरी परियोजना की कमान आईआईटी रुड़की के हाथ में सौंपी गई और पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अभयानंद सिंह मौर्य को इसका मुख्य अन्वेषक (प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर) बनाया गया। वैज्ञानिकों ने अलकनंदा नदी बेसिन के अंतर्गत लगभग 143 वर्ग किलोमीटर में फैले तकोली गाड इलाके का बारीक अध्ययन शुरू किया। लक्ष्य एक ही था—यह समझना कि आखिर पहाड़ों के पेट में पानी रुकता कहां है और बहकर जाता कहां है?

लैब से जमीन तक: दो बड़े वैज्ञानिक अध्ययनों की सफलता

आईआईटी रुड़की की टीम ने अपनी खोज को मजबूत करने के लिए दो अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययन किए। ‘हाइड्रोलॉजिकल साइंसेज जर्नल’ में प्रकाशित पहले शोध में वैज्ञानिकों ने स्थिर और रेडियो समस्थानिकों (Isotopes) और ट्रिटियम मापन तकनीक का इस्तेमाल किया। इससे यह साफ हुआ कि पहाड़ों में जमीन के अंदर जमा होने वाले पानी में 82 प्रतिशत योगदान मानसूनी बारिश का होता है। शीतकालीन बारिश केवल 10 प्रतिशत और मानसून-पूर्व की बारिश 8 प्रतिशत योगदान देती है। यानी मानसून का पानी ही पूरे साल पहाड़ों की प्यास बुझाता है। ‘एप्लाइड जियोकेमिस्ट्री’ में प्रकाशित दूसरे शोध में यह देखा गया कि पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना और चट्टानें पानी की रासायनिक गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करती हैं। इसमें पाया गया कि चूना पत्थर (कार्बोनेट शैल) का अपक्षय और मानसूनी रीचार्ज पानी के गुणों को तय करते हैं।

ऐसे बना नया जलस्रोत: भू-भौतिकी का सटीक गणित

इन दोनों अध्ययनों से मिली जानकारियों को कागजों से निकालकर जमीन पर आजमाया गया। वैज्ञानिकों ने भू-भौतिकीय जांच (Geophysical Investigation) के जरिए जमीन के अंदर उन चट्टानी परतों की पहचान की, जिनके भीतर पानी रोकने और उसे आगे बहाने की क्षमता थी। चट्टानों की गहराई का अंदाजा लगाने के बाद ऊंचौन गांव (कीर्तिनगर ब्लॉक, तकोली पोस्ट) के ऊपरी ढलान पर कई विशेष खाइयां बनाई गईं। जब बारिश हुई, तो इन खाइयों ने तेजी से बहकर निकल जाने वाले पानी की रफ्तार धीमी कर दी। इससे पानी को जमीन के भीतर रिसने का भरपूर मौका मिला और भूजल का स्तर तेजी से बढ़ गया। इसके बाद चिन्हित किए गए वाटर-बेयरिंग ज़ोन से पानी को बाहर निकालने के लिए एक नियंत्रित रास्ता तैयार किया गया। नतीजा यह हुआ कि चंद्रबदनी मंदिर मार्ग के किनारे एक नया और लबालब जलस्रोत उभर आया।

ऊंचौन गांव में छाई खुशी, महिलाओं को बहुत

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।

संबंधित समाचार (Related News)