उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के रूप में जाना जाता है, एक बार फिर से सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक सहअस्तित्व को केंद्रित एक महत्वपूर्ण मांग का विषय बन गया है। राज्य में निवास करने वाले लगभग 15 लाख से अधिक बिहार और पूर्वांचल के लोगों की पुरानी और गहन आकांक्षा को पूरा करने के लिए बिहारी महासभा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से छठ पूजा के अवसर पर राज्यभर में सार्वजनिक अवकाश घोषित करने का आग्रह किया है। छठ पर्व, जो सूर्य देवता और प्रकृति की पूजा से जुड़ा हुआ है, केवल एक त्योहार नहीं बल्कि उत्तर भारत की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख स्तंभ है। इस अवसर पर महासभा ने जो पक्ष प्रस्तुत किया है, वह प्रवासी समुदायों के अधिकारों और राज्य की सहज सांस्कृतिक गतिशीलता को दर्शाता है, जहां हर धर्म और परंपरा का सम्मान किया जाता है।
बिहारी महासभा के अध्यक्ष ललन सिंह के नेतृत्व में एक प्रमुख प्रतिनिधिमंडल ने आज मुख्यमंत्री कार्यालय में एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि छठ पर्व को मान्यता देना न केवल प्रवासी समाज के सम्मान का प्रतीक होगा, बल्कि यह राज्य की आधिकारिक नीति की भी झलक देगा। ललन सिंह ने डेटा के आधार पर तर्क दिया कि देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, रुद्रपुर और काशीपुर सहित पूरे राज्य में बिहार और पूर्वांचल के निवासियों की आबादी बहुत उल्लेखनीय है। इनमें से अनेक सरकारी विभागों और निजी संस्थानों में कार्यरत हैं, जिन्हें वर्तमान में छुट्टी न मिल पाने के कारण पूजा-पाठ की अनुष्ठानों में बाधा का सामना करना पड़ता है। उन्होंने तर्क दिया कि सार्वजनिक अवकाश की घोषणा से इन लोगों को अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने का पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे उनके बीच सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संतुलन बनेगा।
महासभा ने अपने पत्र में छठ पर्व की विशिष्टता और वैश्विक महत्व पर भी प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा कि छठ प्रकृति, सूर्य और लोक आस्था से जुड़ा विश्व का एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसे यूनेस्को ने भी सराहा है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और अब हरियाणा जैसे राज्यों में इस पर्व के लिए सार्वजनिक अवकाश दिया जा चुका है, जो कि उत्तराखंड के लिए एक प्रासंगिक उदाहरण है। देहरादून में हर साल प्रेम नगर, टपकेश्वर, चंद्रवणी और मालदेवता जैसे घाटों पर हजारों श्रद्धालु इकट्ठे होकर छठ मनाते हैं। महासभा का मानना है कि यदि सरकार इस दिन को अवकाश घोषित करती है, तो प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था और अन्य आवश्यक इंतजामات बनाने में भी आसानी होगी, जिससे पर्व अधिक भव्यता और सुरक्षा के साथ मनाया जा सकेगा। यह कदम न केवल प्रवासी समुदाय के लिए राहत की सांस होगी, बल्कि उत्तराखंड की सहिष्णु और बहुलवादी पहचान को मजबूत भी करेगा।
