उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में हालिया कैबिनेट बैठक में जौनसारी के नाम को “जन्नासरी” से “जौनसारी” में बदलने की सिफ़ारिश केंद्र सरकार को भेजने का निर्णय लिया गया। इस कदम के बाद, आरटीआई सक्रिय वकील‑वकील वकीश नेगी ने तुरंत राज्य सरकार और देहरादून जिला प्रशासन से दो स्पष्ट मांगें रखी हैं। उन्होंने कहा कि जब तक केंद्र से इस पर अंतिम निर्णय नहीं निकलता, जौनसार के किसी भी “अगड़ी” जाति के लोगों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि पिछले प्रशासनों की त्रुटिपूर्ण मंज़ूरी से हजारों अनधिकृत व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ मिला है, जबकि वास्तविक वंचित समुदाय अभी भी विकास की धारा से दूर हैं।
वकीश नेगी ने स्पष्ट किया कि 28 नवम्बर 2000 के बाद जौनसार में जारी किए गए सभी एसटी प्रमाणपत्र “पूरी तरह से अवैध” हैं। उन्होंने जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि वह तुरंत ब्राह्मण, खस और क्षत्रियों को दिया गया एसटी प्रमाणपत्र निरस्त कर दे, और केंद्र की स्पष्ट स्वीकृति तक इस क्षेत्र में नया कोई प्रमाणपत्र जारी न किया जाए। उनका दावा है कि कोल्टा और बजगी समुदायों के हकों पर इन “अयोग्य” ब्राह्मण‑क्षत्रिय वर्गों ने आरक्षण का दुरुपयोग किया है, जबकि कोल्टा‑बजगी जनजातियों के लोग अभी भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
वकीश नेगी ने इस मुद्दे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी उजागर की। 1967 के राष्ट्रपति आदेश और लोकुर‑डेबुर समिति की रिपोर्ट दोनों ही स्पष्ट रूप से बताती हैं कि जौनसार में आरक्षण जनजातीय समुदाय के आधार पर होना चाहिए, न कि क्षेत्रीय आधार पर। इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट ने इस मामले को सुनवाई के दायरे में रखा है और सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। न्यायालयीय जांच के साथ-साथ यह विवाद संसद में भी उठाया गया है, जहाँ बिना विधायी प्रस्ताव के कोई परिवर्तन संभव नहीं है, उनका कहना है।
वकीश नेगी ने अंत में कहा कि यदि केंद्र सरकार की संस्तुति में देरी या अनिच्छा बनी रहती है, तो वह न्यायिक उपायों की ओर रुख करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि जौनसार के वास्तविक एसटी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए सभी स्तरों पर ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, अन्यथा सामाजिक न्याय और विकास का दायरा अधूरा रहेगा।
