देहरादून की साहित्यिक और कलात्मक धरोहर में एक और अमूल्य मीथक लुप्त हो गई है। हिंदी और उर्दू साहित्य की सेवा में 60 वर्षों से अधिक समय निपुणता से खर्च करने वाले महान शायर, फोटोग्राफर और चित्रकार ज़िया नहटौरी (असली नाम सैयद ज़िया-उल-हसन जैदी) का सोमवार सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। 86 वर्ष की आयु में उनका देहांत होते ही पूरे उत्तराखंड के सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। सोमवार शाम को मेहूंवाला स्थित कब्रिस्तान में नम आंखों के बीच उन्हें अंतिम विदाई दी गई। उनका निधन न केवल एक शायर के रूप में, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व की हानि का रूप लेता है, जिन्होंने अपनी सादगी और निरपेक्षता से समाज में सद्भाव का एक नया अध्याय लिखा।
ज़िया नहटौरी के निधन के पीछे एक दुखद चिकित्सीय संदर्भ भी है। करीब 15 दिन पहले उन्हें प्रोस्टेट की गंभीर समस्या के कारण दून अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उनका सफल ऑपरेशन हुआ था। डिस्चार्ज होने के बाद वे अपने निवास पर स्वस्थ हो रहे थे, लेकिन रविवार को अचानक उन्हें हृदय गति रुकने (हेार्ट अटैक) की शिकायत हुई। उन्हें तुरंत महंत इंद्रेश अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां चिकित्सकों के अथक प्रयासों के बावजूद सोमवार सुबह उन्हें अपनी अंतिम सांस ली। उनके पीछे एक बेटा और दो बेटियों सहित संतोषी परिवार शेष रह गया है।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान उनकी ‘खुद्दारी’ और निस्वार्थ सेवा का भाव था। धामावाला स्थित कमल मार्केट में अपने फोटो स्टूडियो के जरिए उन्होंने लगभग 40 वर्षों तक उर्दू भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए निःशुल्क सेवाएं दीं। ‘सुखन’ साहित्य संस्था की स्थापना करके उन्होंने साहित्य को आम जनता तक पहुंचाने की कोशिश की। उल्लेखनीय है कि उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें ओएनजीसी (ONGC) में सरकारी नौकरी मिली थी, लेकिन उन्होंने अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा और कला के प्रति समर्पण को प्राथमिकता देते हुए उस सुरक्षित नौकरी को छोड़ दिया था। उन्होंने जीवन भर किराए के मकान में रहते हुए भी अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखा।
उत्तराखंड भाषा संस्थान के सदस्य और वरिष्ठ शायर अफजल मंगलोरी ने ज़िया साहब के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वे न केवल एक शायर थे, बल्कि एक दरियादिल इंसान थे जिन्होंने कई नए कवियों को तराशा और प्रोत्साहित किया। मंगलोरी ने दावा किया कि वे शीघ्र ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात कर ज़िया नहटौरी के परिवार को मरणोपरांत उचित सम्मान और सहायता दिलवाने के लिए औपचारिक निवेदन करेंगे। अन्य संवेदना व्यक्त करने वालों में शायर अम्बर खरबंदा, असलम खतौलवी, विजय द्रोणी, नदीम बर्नी, पूर्व राज्य मंत्री आर ए खान और याकूब सिद्दीकी शामिल हैं।
पुस्तक ‘तजकिरा-ए-शुअरा-ए-किराम उत्तराखंड’ के अनुसार, ज़िया नहटौरी का जन्म 4 जनवरी 1940 को देहरादून के करनपुर में हुआ था, जहां उनके पिता एफआरआई में कार्यरत थे। उन्होंने 1956 में हाई स्कूल की परीक्षा दी और बाद में फाइन आर्ट की गहराई से अध्ययन किया। उनका शायराना हुनर उस्ताद शंकर स्वरूप भटनागर ‘मफतू’ से सीखा। दूरदर्शन के कार्यक्रम ‘साहित्य-यात्रा’ में भी उनकी उर्दू अदब पर विचारों की व्याख्या का दस्तावेज मौजूद है। ज़िया नहटौरी की ग़ज़ल “सवाल-ए-हक़ का जब भी उल्टा जवाब निकलेगा…” आज भी उत्तराखंड के साहित्यिक इतिहास में एक स्थायी पैमाना बनाई हुई है, जो उनकी बेबाक सच्चाई और समाज के ज़ुल्म के विरुद्ध खड़े रहने का प्रतीक है।
