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वसुधरा ताल पर लगी “अर्ली वॉर्निंग सिस्टम” ने उत्तराखंड को दिया नया सुरक्षा कवच

कल्पना कीजिए—समुद्र तल से हजारों फीट ऊपर, शून्य से नीचे बर्फीली हवा, ऑक्सीजन की कमी और चारों ओर फैले विशालकाय हिमनदों के बीच। ऐसे कठोर माहौल में, उत्तराखंड के चमोली जिले की वसुधरा ताल पर देश का पहला आधुनिक “अर्ली वॉर्निंग सिस्टम” सफलतापूर्वक स्थापित किया गया। 29 सितंबर को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के झंडे तले शुरू हुई यह मिशन, मंगलवार को देहरादून लौटे वैज्ञानिकों और सुरक्षा बलों के साहसिक कार्य का परिणति है।

मिशन का उद्देश्य सरल पर गहरा था: हिमालयी ग्लेशियल झीलों के पिघलने और GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) के बढ़ते खतरे को समय रहते पहचानना। 38.5 मीटर गहरी, 600 मीटर चौड़ी और 900 मीटर लंबी वसुधरा ताल पर लगे सेंसर, जलस्तर, मौसम, भू-गतिविधि और हिमस्खलन जैसी हर छोटी प्राकृतिक हलचल को 24 घंटे निगरानी करेंगे। डेटा हर दो घंटे में सैटेलाइट के माध्यम से सीधे USDMA के देहरादून और रुड़की के कंट्रोल रूम तक पहुँचता है, जबकि आपात स्थिति में रियल‑टाइम अलर्ट तुरंत भेजे जाते हैं।

सिस्टम को ऊँचाई और बर्फीले पानी के कारण मोबाइल नेटवर्क से बाहर होने के बावजूद, इरिडियम सैटेलाइट कम्युनिकेशन और सोलर पैनल‑बैटरी सेटअप ने विश्वसनीय डेटा ट्रांसमिशन सुनिश्चित किया। 10 दिन तक बिना धूप के भी यह प्रणाली बिना रुके कार्य करती है।

राज्य के आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस उपलब्धि पर गर्व जताया। धामी ने कहा, “हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में संभावित खतरों की निगरानी से नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।” इसी तरह, आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने वैज्ञानिकों और जवानों की प्रशंसा करते हुए बताया कि अब सटीक जलस्तर और मौसम के आंकड़ों से समय रहते सुरक्षा कदम उठाए जा सकेंगे।

डॉ. डी.पी. कानूनगो के नेतृत्व में CBRI और WIHG के वैज्ञानिकों ने, साथ ही SDRF, NDRF और ITBP के जवानों ने मिलकर यह मिशन पूरा किया। अब वसुधरा ताल से उत्पन्न होने वाली किसी भी आपदा का खतरा पहले ही पता चल जाएगा, जिससे नीचे घाटी के गांवों और कस्बों के लोगों को समय रहते चेतावनी मिल सकेगी।

Original Title: अब पहले ही मिल जाएगा आपदा का इशारा !, वसुंधरा ताल में लगा देश का आधुनिक ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’

Original Content: कल्पना कीजिए… समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर शून्य से नीचे जमता तापमान, तेज बर्फीली हवाएं, सांस फुला देने वाली ऑक्सीजन की कमी और चारों तरफ फैले विशालकाय हिमनद (ग्लेशियर)। ऐसे कठिन माहौल में जहां इंसान का चंद घंटे टिकना मुश्किल होता है, वहां हमारे वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो आने वाले समय में उत्तराखंड के लाखों लोगों की जिंदगी की रक्षा करेगा।

वसुंधरा ताल में लगा देश का आधुनिक ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित प्रसिद्ध वसुंधरा ताल (ग्लेशियल झील) में देश की सबसे आधुनिक ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ (पूर्व चेतावनी प्रणाली) का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। इस बेहद चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरे मिशन को पूरा करके वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का दल देहरादून लौट आया है।

मंगलवार को जब यह जांबाज दल वापस पहुंचा, ‘उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ (USDMA) में आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने सभी वैज्ञानिकों और सुरक्षा बलों के जवानों का गर्मजोशी से इस्तकबाल किया। राज्य में किसी ग्लेशियल झील पर इस तरह का आधुनिक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाने का यह पहला प्रयोग है, जो आपदा प्रबंधन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।

क्या था यह मिशन और क्यों थी इसकी जरूरत?

हिमालयी क्षेत्रों में पिछले कुछ सालों में जिस तरह से मौसम बदल रहा है, उससे ग्लेशियरों के पिघलने और उनके बीच में बनी झीलों के टूटने (जिसे वैज्ञानिक भाषा में GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood कहते हैं) का खतरा काफी बढ़ गया है। केदारनाथ और चमोली की पुरानी घटनाओं को याद करें तो समझ आता है कि अगर झील अचानक टूटती है, तो निचले इलाकों में तबाही मचा देती है।

इसी खतरे को समय रहते भांपने के लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत वसुंधरा ताल को चुना। गत 29 सितंबर को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने इस दल को झंडी दिखाकर रवाना किया था। वैज्ञानिकों का मकसद साफ था—वसुंधरा ताल में ऐसे आधुनिक सेंसर और उपकरण लगाना, जो झील के अंदर और बाहर होने वाली हर छोटी-से-छोटी प्राकृतिक हलचल की जानकारी सीधे देहरादून और रुड़की में बैठे अधिकारियों तक पहुंचा सकें।

मुख्यमंत्री धामी और आपदा प्रबंधन मंत्री कौशिक ने जताई खुशी

इस ऐतिहासिक सफलता पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बेहद प्रसन्नता जताई है। उन्होंने कहा- “उत्तराखंड जैसे कठिन पर्वतीय राज्य में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे की समय रहते पहचान करना सबसे जरूरी है। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक रिसर्च और सभी सरकारी संस्थाओं के तालमेल से हम अपनी आपदा प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत बना रहे हैं। वसुंधरा ताल में लगी यह प्रणाली हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में संभावित खतरों की निगरानी करेगी और संवेदनशील इलाकों में रहने वाले हमारे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।”

वहीं, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने इस अभियान की सफलता के लिए वैज्ञानिकों और जवानों की तारीफ करते हुए कहा कि अब हमें मौसम, बर्फबारी और झील के जलस्तर से जुड़े सटीक वैज्ञानिक आंकड़े मिलेंगे, जिससे समय रहते सुरक्षा के कदम उठाए जा सकेंगे।

38.5 मीटर गहरी झील और शून्य के नीचे काम करने की चुनौती

केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की के वरिष्ठ वैज्ञानिक और इस अभियान दल के नेतृत्वकर्ता डॉ. डीपी कानूनगो ने वसुंधरा ताल के बारे में कई दिलचस्प बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि वसुंधरा ताल लगभग 38.50 मीटर (करीब 126 फीट) गहरी, 600 मीटर चौड़ी और 900 मीटर लंबी है। वैज्ञानिकों ने पुराने आंकड़ों और वर्तमान स्थिति का मिलान किया तो पाया कि फिलहाल झील के आकार या जलस्तर में कोई असामान्य बदलाव नहीं हुआ है। चेतावनी प्रणाली को झील के पास एक ऐसी जगह स्थापित किया गया है, जहां अचानक भूस्खलन (लैंडस्लाइड) या हिमस्खलन (एवलांच) गिरने का खतरा कम से कम हो, ताकि उपकरण सुरक्षित रहें।

दुर्गम पहाड़ों में भारी-भरकम वैज्ञानिक उपकरणों को ले जाना, उन्हें झील के बर्फीले पानी में स्थापित करना और वहां तेज बर्फीली हवाओं के बीच काम करना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं था। इस काम में CBRI रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG) के वैज्ञानिकों के साथ-साथ SDRF, NDRF और ITBP के जवानों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।

तकनीक का कमाल: जानिए ताल में कौन-कौन से ‘सुपर सेंसर’ लगे हैं?

वसुंधरा ताल में लगे ये उपकरण किसी इंसान की तरह 24 घंटे जागकर ताल की रखवाली करेंगे। इसमें कई तरह के अत्याधुनिक सेंसर लगाए गए हैं-

ऑल-इन-वन मौसम सेंसर:

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।