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 पेटा इंडिया ने माँग की मीट विज्ञापनों पर राष्ट्रीय प्रतिबंध, गांधी जयंती को “अहिंसा” के संदेश से जोड़ते हुए

 गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर को पशु अधिकारों की अग्रणी संस्था पेटा इंडिया ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को औपचारिक पत्र भेजा, जिसमें टीवी, बिलबोर्ड, इंटरनेट और सभी सार्वजनिक माध्यमों पर मीट (मांस) के विज्ञापनों पर पूर्ण राष्ट्रीय प्रतिबंध की माँग की गई है। पेटा के अनुसार, इस कदम से महात्मा गांधी के “अहिंसा” के सिद्धांत को सच्ची श्रद्धांजलि मिलेगी और साथ ही जानवरों, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा होगी।

पेटा ने अपने पत्र में हाल ही में भारत‑नेपाल में बाढ़ के बाद पर्यावरण सुरक्षा पर बढ़ती चिंताओं का हवाला देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में विश्व के प्रमुख नेताओं के लिए शाकाहारी और पारंपरिक भारतीय व्यंजनों का मेन्यू तैयार किया था। यूरोप में भी कई शहरों ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है; नीदरलैंड्स के एम्स्टर्डम और हार्लेम ने सार्वजनिक स्थानों पर मीट विज्ञापनों को प्रतिबंधित कर दिया है, जबकि उट्रेक्ट और निजमेगेन ने समान कड़े नियम लागू किए हैं।

पेटा इंडिया की वरिष्ठ प्रबंधक डॉ. किरण आहूजा ने कहा कि प्रत्येक मीट विज्ञापन एक ऐसे उत्पाद को बढ़ावा देता है जो “बेजुबान जानवरों को असहनीय दर्द, इंसानी सेहत को नुकसान और प्रकृति को क्षति” पहुंचाता है। उनकी रिपोर्ट में उजागर किया गया है कि मुर्गियों को होश में रहते हुए ही कटा जाता है, मवेशियों और भैंसों को गाड़ियों में इतनी कसकर भर दिया जाता है कि हड्डियां टूट जाती हैं, और सुअर, बकरी तथा मछलियों के साथ भी कटाई‑परिवहन के दौरान क्रूर व्यवहार किया जाता है। पेटा का तर्क है कि जानवर भी दर्द, भावनाएँ और सामाजिक बंधन महसूस करते हैं, इसलिए उनके पीड़ादायक प्रयोग को विज्ञापनों के माध्यम से बढ़ावा देना नैतिक रूप से गलत है।

मीट उद्योग के स्वास्थ्य जोखिमों की ओर भी प्रकाश डाला गया है। विश्व स्तर पर उपयोग की जाने वाली लगभग 73 प्रतिशत एंटीबायोटिक दवाएं पशुपालन में लगाई जाती हैं, जिससे एंटी‑माइक्रोबियल रेजिस्टेंस तेज़ी से बढ़ रहा है; अनुमान है कि 2050 तक भारत में इससे लगभग 20 लाख लोगों की मौत हो सकती है। साथ ही, चिकन फार्मों से फैलने वाला H5N1 बर्ड फ्लू संभावित महामारी बन सकता है, जिसकी मानव मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।

भारत विश्व में सबसे बड़ी शाकाहारी आबादी वाला देश है, जहाँ लगभग 10 प्रतिशत लोग पूरी तरह वेगन जीवनशैली अपनाते हैं। सदियों पुरानी अहिंसा‑आधारित भोजन परम्परा को देखते हुए मीट विज्ञापनों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव देश को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए एक स्वस्थ, संवेदनशील और टिकाऊ भविष्य की ओर ले जाने की महत्त्वपूर्ण दिशा माना जा रहा है।

Original Title: PETA India ने की मीट के विज्ञापनों पर पाबंदी लगाने की मांग?, जाने वजह

Original Content: गांधी जयंती के अवसर पर पशु अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘पेटा इंडिया’ (PETA India) ने देश में मीट (मांस) के विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग उठाई है। पेटा ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र भेजकर 2 अक्टूबर से टीवी, बिलबोर्ड, इंटरनेट और अन्य सभी माध्यमों पर मीट विज्ञापनों पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने की अपील की है। संस्था का मानना है कि यह कदम महात्मा गांधी के ‘अहिंसा’ के संदेश को सच्ची श्रद्धांजलि देने के साथ-साथ जानवरों, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा करेगा। ब्रिक्स सम्मेलन की दी मिसाल हाल ही में भारत और नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद पर्यावरण सुरक्षा को लेकर चर्चाएं तेज हुई हैं। पेटा ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में दुनिया के शीर्ष नेताओं के लिए पूरी तरह शाकाहारी और पारंपरिक स्वादिष्ट व्यंजनों का आयोजन किया था। इसके अलावा, यूरोप के कई शहर पहले ही पर्यावरण की चिंता के कारण मीट विज्ञापनों पर पाबंदी लगा चुके हैं। नीदरलैंड्स के एम्स्टर्डम और हार्लेम जैसे शहरों ने सार्वजनिक स्थानों पर मीट विज्ञापनों को प्रतिबंधित कर दिया है, जबकि उट्रेक्ट और निजमेगेन ने भी ऐसे कड़े नियम लागू किए हैं। गांधी जी की विरासत और अहिंसा का संदेश पेटा इंडिया की वरिष्ठ प्रबंधक डॉ. किरण आहूजा ने कहा कि मीट का हर विज्ञापन एक ऐसे उत्पाद को बढ़ावा देता है जो बेजुबान जानवरों को असहनीय दर्द देता है, इंसानी सेहत को नुकसान पहुंचाता है और प्रकृति को नुकसान पहुंचाता है। पेटा की मांग है कि गांधीजी की अहिंसा की विरासत का सम्मान करते हुए देश में मीट विज्ञापनों को खत्म किया जाए और भारत की दयालु, स्वस्थ और टिकाऊ शाकाहारी भोजन परंपराओं को बढ़ावा दिया जाए। जानवरों पर क्रूरता का कड़वा सच पेटा इंडिया की जांच रिपोर्टों में उजागर हुआ है कि मीट उद्योग में मुर्गियों को होश में रहते हुए ही काट दिया जाता है। मवेशियों और भैंसों को गाड़ियों में इस कदर ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है कि उनकी हड्डियां टूट जाती हैं। सुअरों, बकरियों और मछलियों के साथ भी परिवहन और कटाई के दौरान बेहद निष्ठुर व्यवहार होता है। पेटा का कहना है कि जानवर भी दर्द, भावनाएं और सामाजिक जुड़ाव महसूस करते हैं, इसलिए उनकी पीड़ा को विज्ञापनों के जरिए बढ़ावा देना गलत है। सार्वजनिक स्वास्थ्य और बीमारियों का खतरा मीट उद्योग केवल जानवरों ही नहीं, बल्कि इंसानी सेहत के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाली लगभग 73% एंटीबायोटिक दवाएं पशुपालन में उपयोग की जाती हैं, जिससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (दवाओं का बेअसर होना) तेजी से बढ़ रहा है। अनुमानों के मुताबिक, 2050 तक भारत में इसके कारण करीब 20 लाख लोगों की मौत हो सकती है। इसके अलावा, चिकन फार्मों से फैलने वाला H5N1 बर्ड फ्लू भी महामारी का रूप ले सकता है, जिसकी मृत्यु दर इंसानों में 50% तक दर्ज की गई है। भारत की शाकाहारी परंपरा और वेगन संस्कृति भारत दुनिया में सबसे बड़ी शाकाहारी आबादी वाला देश है, जहां लगभग 10% लोग पूरी तरह से ‘वेगन’ (Vegan) जीवनशैली अपना चुके हैं। अहिंसा पर आधारित भारत की भोजन संस्कृति सदियों पुरानी है। ऐसे में मीट विज्ञापनों पर प्रतिबंध का यह प्रस्ताव देश को अपनी जड़ों से जोड़ने और एक स्वस्थ, संवेदनशील भविष्य की ओर ले जाने की एक महत्त्वपूर्ण कोशिश है। Khabar Uttarakhand – Uttarakhand News.

admin सत्यापित पत्रकार

आधिकारिक पत्रकार एवं विशेष संवाददाता।