उत्तराखंड में NEET‑UG के माध्यम से MBBS प्रवेश से जुड़े फर्जी स्वतंत्रता‑सैनिक कोटे के प्रमाण‑पत्रों की जाँच तेज़ी से आगे बढ़ रही है। विशेष जांच टीम (SIT) ने इस महीने के मध्य में बिहार के दो नागरिक, रूपेश पंडित और अरविंद कुमार, को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस के अनुसार, पंडित पिछले पाँच वर्षों से मेरठ के द्वारिकापुरी कॉलोनी में “मिकोडो पाठशाला” नाम की कंसल्टेंसी चलाते आ रहे थे, जहाँ देश‑विदेश के निजी विश्वविद्यालयों व विदेशी MBBS कोर्सों के प्रवेश कार्य भी होते थे। इस कंसल्टेंसी के माध्यम से उन्होंने स्वतंत्रता‑सैनिक धर्मवीर वर्मा के नाम पर फर्जी प्रमाण पत्र तैयार करवाए और उम्मीदवारों को सरकारी मेडिकल सीट दिलाने का सौदा किया। प्रत्येक सीट के लिये 45 लाख रुपये का भुगतान तय था, जबकि शुरुआती अग्रिम के रूप में तीन छात्राओं के अभिभावकों से 20‑20 लाख रुपये (कुल 60 लाख) लिये गये।
जांच के दौरान पता चला कि तीन महिला अभ्यर्थियों – क्रमशः 301, 338 और 400 अंक प्राप्त करने वाली – को क्रमशः श्रीनगर, हल्द्वानी और हरिद्वार के मेडिकल कॉलेजों में स्वतंत्रता‑सैनिक कोटे के तहत सीटें आवंटित की गयीं। एक और छात्रा के 234 अंक थे, पर उसे कोई सीट नहीं मिली और उसका प्रमाण‑पत्र फर्जी सिद्ध हुआ। कुल 18 सीटें इस कोटे में उपलब्ध हैं, जिनमें 11 सरकारी और 7 निजी सीटें शामिल हैं। फर्जी दस्तावेज़ों के कारण अब इन सीटों के आवंटन एवं सत्यापन प्रक्रिया की भी गहरी जाँच चल रही है।
इस स्कैंडल के कारण प्रशासनिक स्तर पर भी धक्का महसूस किया गया। दो लेखपालों को निलंबित कर दिया गया और उनके द्वारा जारी किए गये दस्तावेज़ों की वैधता पर सवाल उठे। पहले की शिकायतों के आधार पर यह भी जांचा जा रहा है कि इन लेखपालों के खिलाफ मुख्यमंत्री पोर्टल व जिला अधिकारी कार्यालय में पहले कौन‑सी शिकायतें दर्ज हुई थीं और उन पर क्या कार्रवाई हुई। डिजिटल फोरेंसिक के तहत आरोपी के मोबाइल से कॉल‑डिटेल, चैट, दस्तावेज़ और अन्य डिजिटल साक्ष्य निकाले जा रहे हैं, जिससे नेटवर्क में जुड़े अन्य 12 संदिग्धों के नाम सामने आए हैं।
केस की प्रगति के क्रम में 3 सितंबर को प्रदीप बहुगुणा ने इस मुद्दे को लेकर मंत्री व जिला अधिकारी को शिकायत की, 5 सितंबर को चिकित्सा शिक्षा मंत्री ने जांच के निर्देश दिए, 9 सितंबर को जिलाधिकारी ने CDO‑ADM की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की, तथा 18 सितंबर को एसएसपी प्रमेंद्र दोबाल ने 10‑सदस्यीय SIT का गठन किया। 20 सितंबर को हरिद्वार मेडिकल कॉलेज के एक छात्र के मूल दस्तावेज़ जब्त कर पूछताछ की गई और 22 सितंबर को दो आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ी। आगे के दिनों में बैंक लेन‑देन, मोबाइल डेटा और दस्तावेज़ों के विश्लेषण से इस जाल में शामिल अतिरिक्त व्यक्तियों की पहचान होने की उम्मीद है।
Original Title: उत्तराखंड: NEET UG MBBS केस में खुलती जा रही परतें, फर्जी प्रमाण पत्र के बाद अब लेखपालों का रिकॉर्ड खंगाला जा रहा
Original Content: NEET UG MBBS Fake Certificate Case | SIT Investigation | Uttarakhand : उत्तराखंड में NEET UG के जरिए MBBS दाखिले से जुड़े फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र मामले की जांच अब तेजी से आगे बढ़ रही है। एसआईटी ने मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस की जांच में फर्जी प्रमाण पत्र तैयार कराने से लेकर अभ्यर्थियों को मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने तक एक संगठित नेटवर्क के संकेत मिले हैं।
पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपियों में बिहार निवासी रूपेश पंडित और अरविंद कुमार शामिल हैं। जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर अभ्यर्थियों को स्वतंत्रता सेनानी कोटे के जरिए सरकारी मेडिकल सीट दिलाने का सौदा किया जाता था। एक सीट के लिए 45 लाख रुपये तक की रकम तय किए जाने की बात सामने आई है।
जांच के अनुसार आरोपी ने उत्तराखंड में तीन छात्राओं को स्वतंत्रता सेनानी कोटे के तहत सरकारी MBBS सीट दिलाने का भरोसा दिया था। पुलिस के मुताबिक तीनों छात्राओं के परिजनों से 20-20 लाख रुपये एडवांस लिए गए थे। इस तरह कुल 60 लाख रुपये एडवांस लेने की बात सामने आई है।
आरोप है कि प्रत्येक सीट के लिए कुल 45 लाख रुपये का सौदा तय किया गया था। बाकी रकम दाखिले की प्रक्रिया पूरी होने के बाद लिए जाने की बात जांच में सामने आई है।
एसआईटी अब उन फर्जी प्रमाण पत्रों की भी पड़ताल कर रही है…जो कथित तौर पर स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर वर्मा के नाम से तैयार किए गए। दो अलग-अलग मामलों की जांच में अब तक चार अभ्यर्थियों के नाम सामने आने की जानकारी दी गई है।
जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि प्रमाण पत्र तैयार कराने, आवेदन लगाने और दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया में किन-किन लोगों की भूमिका थी।
पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया है कि इस पूरे मामले में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग भूमिका हो सकती है। कथित तौर पर पहले ऐसे अभ्यर्थियों की तलाश की जाती थी….जिन्हें NEET में अपेक्षित अंक नहीं मिले थे या मनचाहे मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल पा रहा था।
इसके बाद अभ्यर्थी की जरूरत और श्रेणी के अनुसार दस्तावेज तैयार कराने और दाखिले की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का काम किया जाता था। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे और रकम किन-किन माध्यमों से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंची।
गिरफ्तार आरोपी रूपेश पंडित बिहार का रहने वाला बताया गया है। पुलिस के अनुसार वह पिछले करीब पांच साल से मेरठ की द्वारिकापुरी कॉलोनी में मिकोडो पाठशाला नाम से कंसल्टेंसी चला रहा था।
जांच में यह भी सामने आया है कि कंसल्टेंसी के जरिए देश के निजी विश्वविद्यालयों के साथ-साथ विदेशों में MBBS समेत अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में दाखिले से संबंधित काम किया जाता था। अब पुलिस यह जांच कर रही है कि इस गतिविधि का फर्जी प्रमाण पत्र मामले से कितना संबंध था।
दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उनके मोबाइल फोन फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे हैं। मोबाइल से मिलने वाली कॉल डिटेल, चैट, दस्तावेज और दूसरे डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर एसआईटी नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने की कोशिश कर रही है।
पुलिस यह भी जांच रही है कि आरोपियों के संपर्क में कौन-कौन से अभ्यर्थी, परिजन, बिचौलिए या अन्य लोग थे।
जांच में सामने आए मामलों में तीन छात्र
